मंगलवार, 5 मार्च 2013

अनुभव की महत्ता को व्यर्थ न करें - Don't let your experiance be a waste

भगवान के मेरे साथ बने रहने की भावना मुझे हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है और दे रही है। जीवन में संबंधों को लेकर मनुष्य हमेशा दुःख पाता रहता है। इन सब से छुटकारा एक ही तरीक़ा है निःस्वार्थ भाव से सबकी सेवा करना , मन में कोई विषमता न रखना, और हमेशा आगे बढ़ने और समस्या के समाधान की और देखना ही हमें इन सब परिस्थितियों से उबार सकता है।
क्रोध से बचना, किसी को को बुरा नहीं कहना , किसी के प्रति वैमनस्य का भाव न रखना कितना कठिन प्रतीत होता है , वो भी तब ,जब कोई व्यक्ति अपने अहम् पर वार करता है या उन सिद्धांतो पर वार करता है जिन पर हमारे जीवन की आधार शिला खड़ी हो। नकारात्मक भावनाओ पर विजय पा लेना इतना सरल नहीं होता है। इसके लिए निरंतर प्रयास करना होता है। और मेरे विचार से प्रयास करना ही मानव जीवन का मूल उद्देश्य होना चाहिए, परिणाम की चिंता किये बगैर। परन्तु अगर सामने वाला व्यक्ति हमारी चीज़ों को न समझे तो। क्या भाग जाना चाहिए? क्या उसके प्रति उदासीन हो जाना चाहिए? क्या उन चीज़ों पर वाद विवाद करके लड़ना चाहिए? आखिर क्या करना चाहिए? मैं इन सब प्रश्नों के उत्तर को हर जगह क्यों ढूंढ रहा हूँ? मुझे गीता और रामायण में इन प्रश्नों के उत्तर क्यों नहीं मिलते? गीता में तो अर्जुन को युद्ध करने को कहते हैं और वो भी निःसंग होकर। कृष्ण जी ने कैसे कह दिया होगा जाओ और युद्ध करो। ये मत सोचो की जय होगी या पराजय। लेकिन यहाँ तो महाभारत अपने मन में ही चल रहा है। कभी हम ही कौरव हैं और कभी पांडव, कभी धर्म का पक्ष लेते हुए कभी अनजाने में अधर्म करके पश्चाताप से जलते हुए।

रामायण में तो राम जी ने पिता के कहने पर राज्य ही छोड़ दिया। फिर उन्होंने पिता का वचन निभाने के लिए किसी की नहीं सुनी। यहाँ  राज्य धर्म निभाने की लिए सीता का भी परित्याग कर दिया था।

हम हमेशा परिस्थितियों के दास हो जाते हैं और समझ में नहीं आता की हमारे साथ ऐसा क्यूँ। जब हम यह जानते हैं की ये सब समय, परिवेश ऐसा कभी भी एक जैसा नहीं रहेगा, न तो व्यक्ति रहेगा और न तो सम्बन्ध तो हम क्या कर सकते हैं जिससे हम विषम परिस्थितियों में भी अनिर्वचनीय शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकें। कुल मिलाकर अच्छी बूरी परिस्थितियों से हम बच तो कदापि नहीं सकते परन्तु धैर्य पूर्वक पुरुषार्थ करके शान्ति का अनुभव कर सकते हैं।

अब हमारे सामने यही प्रश्न रह जाता है की इन सम-विषम परिस्थितियों का सदुपयोग कैसे करें। सुख का सबसे बड़ा सदुपयोग दूसरों की सेवा है। परन्तु दुःख में निष्काम कर्तव्य कर्म करते रहना ही उद्देश्य होना चाहिए। अगर दुःख प्राप्ति किसी व्यक्ति द्वारा आपको गलत सिद्ध करने पर हो रहा है तो क्या करें? कैसे हम अपने आपको सम्मोहित होने और क्रोधित होने से बचा सकते हैं? अगर सामने वाला आपको आपकी गलती को मानने को बाध्य करे तब क्या करें ?क्या करना चाहिए की सामने वाला व्यक्ति का क्रोध शांत हो जाये और वह संयमित होकर आपकी बातों का आदर करे?

सच तो यह है हम इस बात की गारंटी ले ही नहीं सकते की सामने वाला अपनी बात सुनेगा भी या नहीं। यह भी सच है हम जितना ही उसके सामने सच और धर्म पूर्वक बातों को उसके सामने कहते है और उसकी बातों का विरोध प्रकट करते हैं तो वह अनर्गल और बिना किसी आधार के, मूर्खतापूर्ण तर्क प्रस्तुत करता है। और यदि आप उसे परास्त भी कर लेते हैं तो भी उन बातों को न समझकर वह क्रोध करता है।

कुल मिला कर मुझे इतना समझ में आया की जिस चीज़ को जानते हुए भी हम कुछ नहीं कर सकते तो उसके विषय में चिंतित होना या उसके विषय में दुखी होना मुर्खता होगी। यह ठीक उसी तरह से है जैसे हम रोज़ समाचारों में कई सारी अच्छी बुरी खबर सुनते हैं परन्तु प्रायः हमें उनसे इतना कष्ट नहीं होता जितना उनकी खबरों से जिनको हम अपना मानते हैं या वे हमसे जुड़े हैं। लेकिन इसी बात में एक बहुत बड़ा रहस्य छुपा हुआ है जिसे प्रायः हम नज़रंदाज़ कर जाते हैं। वह महत्वपूर्ण बात यह है की हमें केवल अपनी वृत्तियों को शांत करने और रखने की कोशिश करनी चाहिए। हमें यह बिलकुल भूल ही जाना चाहिए वो हमारे लिए हैं, बल्कि यह सोचना है की हमें इसकी सेवा करनी है, और चाहे उसका मूल्य कुछ भी हो। परन्तु साथ ही साथ उनकी गलत बातों का मुखर विरोध भी करना चाहिए ताकि हमारे मन में अपने गलत होने की कुंठा न हो। प्रायः हम किसी को खुश रखने के लिए उसके सिद्धांतो को बाहर से सम्मति दे देते हैं परन्तु भीतर ही भीतर कुढ़ते रहते हैं। हमें इस चीज़ से बहार आना होगा और हमें जमकर अपनी बातों को रखना होगा,और साथ ही साथ अपनी गलतियों को भी स्वीकार करते हुए चलना होगा।

अब प्रश्न यह उठता है की हमें ये कैसे पता चले की हम कब गलत हैं कब सही। इसके लिए मेरे विचार से थोडा धैर्य चाहिए। अगर हम विपरीत परिस्थितियों में अपना धीरज न खोकर उद्वेलित ना हो तो शायद यह कर सकने में सक्षम हो सकते हैं। परन्तु यह इतना सरल नहीं। अगर हम कोई भी चीज़ करने से पहले से यह सोच ले और दृढ़ विश्वास कर ले की हमें केवल अपने आपको देखना है, अपनी सोच को बदलना है, अपने क्रोध को दबाकर नहीं परन्तु उचित व्यवहार, संयम और तर्कों से सामने वाले की बातों प्रत्युत्तर देना है। हमें अपना स्वभाव नहीं बदलना है परन्तु उसमे होने वाले राग और द्वेष की भावना से विमुक्त होना है। हमें यह देखना होगा की हम बिना क्रोध किये शांत रहकर सामने वाले की सारी बातों का उत्तर कैसे दे सकते हैं।

स्वयं के अनुभव से मुझे ज्ञात हुआ की जब भी हम कोई सन्देश या शिक्षा का वाक्य पढ़ते हैं तो हम तुरंत ही उसे दूसरों पर लागू कर देते हुए यही सोचते हैं इसने तो ऐसा नहीं किया इसलिए वह गलत है और मैं सही हूँ, मैं तो ऐसा करता हूँ, वो नहीं करता। उदाहरण के लिए अगर मैंने पढ़ा की "सच्चा प्रेम बांधकर नहीं बल्कि स्वतंत्र रखकर ही हो सकता है" तो उसी क्षण मैं यह सोचता हूँ की देखो , मैं तो उसे कितना प्यार करता हूँ, उसे स्वतंत्र रखता हूँ लेकिन फिर भी वो मुझे बांधकर रखता है, उसे यह बात नहीं समझ में आती कि सच्चा प्रेम स्वतंत्र रखकर होता है। लेकिन ऐसा सोचते ही हम यह भूल जाते हैं की यह वाक्य दुसरे से ज्यादा अपने पर लागू होता है क्यूंकि हमने इसे पढ़ा है। बाद में अगर मैं इसी वाक्य पर फिर से गहरी सांस लेने के बाद सोचता हूँ तो यह पता चलता है कि मुझे यह सोचना चाहिए की देखो मैंने ही उसे बांध कर रखा हुआ है, इसी वजह से वो मेरे प्यार को नहीं समझता है, आज से मुझे दृढ़ता पूर्वक इसका पालन करूंगा, मैं उसे अपने किसी भी सिद्धांत और विचारों को थोपने की कोशिश नहीं करूंगा परन्तु सत्य जरुर कहूँगा। जी हाँ, सत्य वही है जिसका अनुभव किया गया हो। इसीलिए अनुभव किये हुए विचारों को कहने में कभी भी नहीं डरना चाहिए। जाहिर है सत्य की राह पर विपत्तियाँ भी बहुत आएँगी लेकिन उसमे पूरी तरह संयम और धैर्य रखकर उसे स्वीकार करना चाहिए। स्वीकार करने का यह मतलब बिलकुल नहीं की हम हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाएँ और अकर्मण्य बन जाए। हमें उचित कर्म और कर्तव्यों को करते हुए उस विपत्ति को स्वीकार करना चाहिए। भागना नहीं चाहिए।   
कुल मिलाकर अगर हमें किसी भी समय किसी का दोष दिखे तो तुरंत ही यह चेक कर लेना चाहिए की कहीं यह दोष मेरे में तो नहीं, तुरंत ही यह सोचना चाहिए अगर मैं ऐसा करूंगा तो सामने वाले को दुःख होता होगा, आज से मैं ऐसा नहीं करूँगा। ऐसा सोचते हमें शांति मिलेगी लेकिन अगर हमने सामने वाले की बुराइयों को देखना शुरू किया तो हम अशांत हो जायेंगे, क्रोधित हो जायेंगे, और क्रोध में सम्मोहित हो कर कुछ न कुछ ऐसा कर ही बैठेंगे जिनसे बाद में हमे पश्चाताप करना पड़ेगा। अब फैसला हमें ही करना होगा की हम दूसरों की बुराइयों, अवगुणों  कमियों को देख कर क्रोध और पश्चाताप से जलने के बजाय हम उन्ही चीज़ों से अपना आत्म निरक्षण करके शांति और एकचित्तता का मार्ग प्रशस्त करें। एक कहावत है "तुम जितने पत्थर फेकोंगे हम उनसे ही अपनी मंजिल का रास्ता बना लेंगे"। यह बात सच भी है। लेकिन अगर हम यही पत्थर उल्टा दूसरों पर फेकेंगे तो हम वहीं के वहीं के रह जायेंगे। 

संत कबीर दास जी ने बिल्कुल सही बात कही है कि अपने निंदको को अपने पास रखना चाहिये ताकि आप अपने ख़ुद के दोषों का सुधार कर सकें।

"निंदक निअरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।"

सारांश में बस इतना ही कहा जा सकता है अच्छा और बुरा समय तो आता जाता रहेगा, उसे हम रोक नहीं सकते हैं। ऐसा सोचकर हम भूल करते हैं की हम अपने प्रयत्न से , कोशिश से अच्छा समय ला सकते हैं और बुरा समय दूर कर सकते हैं। हमारा अनुभव ऐसा नहीं कहता। और अपने अनुभव को महत्व न देना मतलब आप सच्चाई को समझ नहीं रहे हैं।
दूसरी बात जब भी हमें जब भी किसी व्यक्ति विशेष से कष्ट हो, दुःख हो, तो उसी पल हमें अपना आत्म निरीक्षण शुरू कर देना चाहिए की कहीं ये अपने में तो नहीं। ऐसा करके आप अपने आपको सम्हाल पाएंगे अन्यथा आपके आप उनपर और वो आपपर पत्थर फेंकते  ही रह जायेंगे और चोट आपको भी लगेगी और सामने वाला भी आपको नहीं समझ पायेगा। और दूरियां बढाती जाएँगी। कुल मिलाकर फैसला आपको ही करना पड़ेगा।

अंततः ये बातें पढ़ने समझने और करने में कठिन हो सकती हैं लेकिन इनका अनुभव करना उतना ही सरल है जितना की एक नवजात शिशु के लिए अपनी माँ को पहचानना।

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