सत्य वही है जो स्वयं को अनुभव होता है या जिसे हम महसूस करते हैं। सत्य वह बिलकुल नहीं जो हमें इन्द्रियों के द्वारा दिखता है क्यूंकि इन्द्रियां भी इसी असत्य का अंश हैं। अगर हम अपनी इन्द्रियों के अनुभव को ही सत्य मानने लगेंगे तब तो हम वैज्ञानिक दृष्टि और अध्यात्मिक दृष्टि , दोनों से ही गलत होंगे। हम पृथ्वी को गोल के बजाय चपटा बोलेंगे जो की वैज्ञानिक रूप से गलत होगा और अगर जीवन के सुख दुखों में ही फंसे रहेंगे तो यह अध्यात्मिक दृष्टिसे अपने आपको अवनति में डालने के बराबर होगा। इसी कारण यदि हम अपने सारे स्वयं के अनुभवों को लेकर स्वयं की खोज करें तो हम वैज्ञानिक और अध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से उन्नति कर विश्व कल्याण और विश्व बंधुत्व की भावना को आत्मसात कर सकेंगे, और तब ही हम जान पाएंगे की हमारे ऋषि, मुनि और ज्ञानी महात्माओं ने जिस परमानन्द की बात की है, वो है क्या ? सो प्रश्न करो , और उत्तर अनुभव करो क्यूंकि अनुभव ही सच्चा ज्ञान है।
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