आपको भी लगता होगा की यह क्या पागलों वाली बात है। लेकिन वास्तव में स्वयं को शांति अपने आप को भूल जाने पर ही मिला करती है। अब आप शायद यह सोच रहे होंगे की भला यह कैसे संभव है ? लेकिन दोस्तों रोजमर्रा के अनुभवों को यदि ध्यान से समझें तो यह बात सत्य प्रतीत होने लगती है।
आपको पता है जब कभी बिलकुल थके हों, सारा शरीर दर्द से भरा हो, तो लगता है बस कही बिस्तर मिले और लेट जायें। लेटते ही नींद आती है और हम सो जाते हैं। सोने पर हम सब कुछ भूल जाते हैं। यहाँ तक की नींद के दौरान हमें यह भी याद नहीं रहता कि हम कहाँ हैं और किस परिस्थिति में है और हमारे आस पास क्या हो रहा है और क्या हुआ? और जब हम इस बाहरी दुनिया और अपने मन बुध्दि और विचारों से भी दूर, कुछ देर सो लेते हैं तो हममें फिर से एक नयी चेतनता और उर्जा भर उठती है। आखिर क्यूँ होता है ऐसा? अगर सोने का मतलब सिर्फ लेटना होता तो हमें आराम केवल बिस्तर पर लेटे रहने से ही हो जाता। लेकिन रात भर बिना नींद के लेटे रहने पर भी हमें वो आराम नहीं मिलता जो सोने अर्थात अपने आपको भूल जाने पर होता है।
ठीक इसी तरह से अगर हम अपने दैनिक जीवन में कोई ऐसा काम करते हों जिसमे की हम अपने आप को ही भूल जाएँ, तो उसके तुरंत बाद कैसी शांति मिलाती है। मेरा स्वयं का अनुभव यही बताता है। जैसे की मैं अपने ऑफिस में जिस दिन जितना खाली रहता हूँ और इधर -उधर की बात सोचता रहता हूँ, उस दिन शाम के वक़्त आने पर उतना ही थका हुआ और निराश महसूस करता हूँ। लेकिन जिस दिन मैंने बहुत काम किया और इतना किया की अपने आपको भूल गया, चाहे वो किसी भी वजह से किया हो। लेकिन उस दिन शाम के वक़्त घर लौटकर एक अजीब सा अच्छापन लगता है। और हम बड़े खुश होकर कहते हैं देखो आज मैंने कितना काम किया।
ठीक इसी तरह से जब एक प्रेमी व्यक्ति, अपनी प्रेमिका के पास पहुंचता है तो उसे उस पल भर में अपने आपको पूरी तरह से भूला कर उसे कितना अच्छा लगता है। परन्तु समस्या यह है की हम यह समझ बैठते हैं की हमें यह शांति और सुख का अनुभव उस वस्तु या व्यक्ति से मिलता है। जो की नहीं है। क्यूंकि अगर हमें किसी व्यक्ति या वस्तु से सुख या शांति मिलती तो ऐसा हमेशा होना चाहिए। प्रायः देखने में तो यही आता है की जब जब हम ऐसा सोचते हैं, तब तब हम भूल से अपने सुख और शांति को दुसरे से पैदा हुआ मानते हैं। और जब हमें यही सुख शांति नहीं मिलती तो हम उसी व्यक्ति और वस्तु को दोष देते हैं। हम यह कहते है पहले तो यह मुझे मानता था अब नहीं मानता। पहले यह वस्तु अच्छी थी अब नहीं। हम यह समझ ही नहीं पाते की हमें जो भी सुख या शांति मिल रही है या मिलती है वो अपने आपको भूला देने पर ही मिलती है। अपने बारे में न सोचकर दूसरों के लिए सोचने में ही वह राज छुपा हुआ है। जिंदगी का मजा,आनंद , किसी को अपना मानने में नहीं बल्कि आपने आपको दूसरों के लिए मानने में है।
दोस्तों, यह बात पूरा अनुभव का विषय है। जैसे की कुछ लोग होते हैं जो बहुत ही बहादुरी वाले करतब करते हैं और उससे उन्हें बड़ा आनंद मिलता है। बंजी जंपिंग, पैराशूट जंपिंग और वगैरह वगैरह। जब आप इतनी ऊंचाई से कूदते हैं तो उस समय डर और उत्साह के कारण आप केवल और केवल यह देखते हैं की आप गिर रहे हैं। लेकिन इस दौरान आप कुछ पल के लिए आपने आपको भूल सा जाते हैं। और उसका आपको मजा मिलता है। लेकिन अगर आप अभ्यस्त हो जायेंगे तो आपको ऐसा मजा नहीं मिलता और आप फिर से नया कुछ करके वैसा ही आनंद पाना चाहते हैं।
जी हाँ मित्रों, हम हमेशा सुख शांति और आनंद की चाह में एक चीज़ को छोड़कर नयी चीज़ों को पकड़ते जाते हैं। लेकिन अफ़सोस अंत में हमें निराशा और दुःख ही मिलता है। और हम इसी उलझन में पड़े पड़े सारी जिंदगी गुजार डालते हैं। हम यह नहीं समझ पाते की मजा दूसरों के लिए जीने में है, यानि अपने आपको भुला देने में है। हर पल हर छण, हमें सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना को बनाये रखना होगा। क्यूंकि जिंदगी को जीने और महान बनाने का तरीका यही है। इतिहास गवाह है की भारत में जितने भी महापुरुष और ज्ञानी हुए हैं उन सबने अपने आपको भूलकर संसार की सेवा की, दुखियों का दुःख अपना दुःख समझा, दूसरों के लिए अपने आप तक को मिटा डाला। आखिर उन्हें ऐसा कौन सा सुख और कौन सा आनंद मिला जो उन्हें ऐसा करने को प्रेरित करता होगा।
साथियों, अगर आप अनुभव को सच्चा ज्ञान समझते हैं तो यह बात समझाने में कठिनाई नहीं होगी।
अंततः भगवान् को अपने आप में देखना ध्यान है और दूसरों में भगवान् को देखना समस्त संसार की सेवा है। और इन दोनों ही तरीकों से हम अपने आप को भुलाने का प्रयास कर सकते हैं। और जब हम अपने आपको भूलते जायेंगे तो स्वयं की आत्म-शांति हमें न जाने क्या अनुभव करा दे।
आपको पता है जब कभी बिलकुल थके हों, सारा शरीर दर्द से भरा हो, तो लगता है बस कही बिस्तर मिले और लेट जायें। लेटते ही नींद आती है और हम सो जाते हैं। सोने पर हम सब कुछ भूल जाते हैं। यहाँ तक की नींद के दौरान हमें यह भी याद नहीं रहता कि हम कहाँ हैं और किस परिस्थिति में है और हमारे आस पास क्या हो रहा है और क्या हुआ? और जब हम इस बाहरी दुनिया और अपने मन बुध्दि और विचारों से भी दूर, कुछ देर सो लेते हैं तो हममें फिर से एक नयी चेतनता और उर्जा भर उठती है। आखिर क्यूँ होता है ऐसा? अगर सोने का मतलब सिर्फ लेटना होता तो हमें आराम केवल बिस्तर पर लेटे रहने से ही हो जाता। लेकिन रात भर बिना नींद के लेटे रहने पर भी हमें वो आराम नहीं मिलता जो सोने अर्थात अपने आपको भूल जाने पर होता है।
ठीक इसी तरह से अगर हम अपने दैनिक जीवन में कोई ऐसा काम करते हों जिसमे की हम अपने आप को ही भूल जाएँ, तो उसके तुरंत बाद कैसी शांति मिलाती है। मेरा स्वयं का अनुभव यही बताता है। जैसे की मैं अपने ऑफिस में जिस दिन जितना खाली रहता हूँ और इधर -उधर की बात सोचता रहता हूँ, उस दिन शाम के वक़्त आने पर उतना ही थका हुआ और निराश महसूस करता हूँ। लेकिन जिस दिन मैंने बहुत काम किया और इतना किया की अपने आपको भूल गया, चाहे वो किसी भी वजह से किया हो। लेकिन उस दिन शाम के वक़्त घर लौटकर एक अजीब सा अच्छापन लगता है। और हम बड़े खुश होकर कहते हैं देखो आज मैंने कितना काम किया।
ठीक इसी तरह से जब एक प्रेमी व्यक्ति, अपनी प्रेमिका के पास पहुंचता है तो उसे उस पल भर में अपने आपको पूरी तरह से भूला कर उसे कितना अच्छा लगता है। परन्तु समस्या यह है की हम यह समझ बैठते हैं की हमें यह शांति और सुख का अनुभव उस वस्तु या व्यक्ति से मिलता है। जो की नहीं है। क्यूंकि अगर हमें किसी व्यक्ति या वस्तु से सुख या शांति मिलती तो ऐसा हमेशा होना चाहिए। प्रायः देखने में तो यही आता है की जब जब हम ऐसा सोचते हैं, तब तब हम भूल से अपने सुख और शांति को दुसरे से पैदा हुआ मानते हैं। और जब हमें यही सुख शांति नहीं मिलती तो हम उसी व्यक्ति और वस्तु को दोष देते हैं। हम यह कहते है पहले तो यह मुझे मानता था अब नहीं मानता। पहले यह वस्तु अच्छी थी अब नहीं। हम यह समझ ही नहीं पाते की हमें जो भी सुख या शांति मिल रही है या मिलती है वो अपने आपको भूला देने पर ही मिलती है। अपने बारे में न सोचकर दूसरों के लिए सोचने में ही वह राज छुपा हुआ है। जिंदगी का मजा,आनंद , किसी को अपना मानने में नहीं बल्कि आपने आपको दूसरों के लिए मानने में है।
दोस्तों, यह बात पूरा अनुभव का विषय है। जैसे की कुछ लोग होते हैं जो बहुत ही बहादुरी वाले करतब करते हैं और उससे उन्हें बड़ा आनंद मिलता है। बंजी जंपिंग, पैराशूट जंपिंग और वगैरह वगैरह। जब आप इतनी ऊंचाई से कूदते हैं तो उस समय डर और उत्साह के कारण आप केवल और केवल यह देखते हैं की आप गिर रहे हैं। लेकिन इस दौरान आप कुछ पल के लिए आपने आपको भूल सा जाते हैं। और उसका आपको मजा मिलता है। लेकिन अगर आप अभ्यस्त हो जायेंगे तो आपको ऐसा मजा नहीं मिलता और आप फिर से नया कुछ करके वैसा ही आनंद पाना चाहते हैं।
जी हाँ मित्रों, हम हमेशा सुख शांति और आनंद की चाह में एक चीज़ को छोड़कर नयी चीज़ों को पकड़ते जाते हैं। लेकिन अफ़सोस अंत में हमें निराशा और दुःख ही मिलता है। और हम इसी उलझन में पड़े पड़े सारी जिंदगी गुजार डालते हैं। हम यह नहीं समझ पाते की मजा दूसरों के लिए जीने में है, यानि अपने आपको भुला देने में है। हर पल हर छण, हमें सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना को बनाये रखना होगा। क्यूंकि जिंदगी को जीने और महान बनाने का तरीका यही है। इतिहास गवाह है की भारत में जितने भी महापुरुष और ज्ञानी हुए हैं उन सबने अपने आपको भूलकर संसार की सेवा की, दुखियों का दुःख अपना दुःख समझा, दूसरों के लिए अपने आप तक को मिटा डाला। आखिर उन्हें ऐसा कौन सा सुख और कौन सा आनंद मिला जो उन्हें ऐसा करने को प्रेरित करता होगा।
साथियों, अगर आप अनुभव को सच्चा ज्ञान समझते हैं तो यह बात समझाने में कठिनाई नहीं होगी।
अंततः भगवान् को अपने आप में देखना ध्यान है और दूसरों में भगवान् को देखना समस्त संसार की सेवा है। और इन दोनों ही तरीकों से हम अपने आप को भुलाने का प्रयास कर सकते हैं। और जब हम अपने आपको भूलते जायेंगे तो स्वयं की आत्म-शांति हमें न जाने क्या अनुभव करा दे।
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