बुधवार, 12 नवंबर 2014

ऊद्धव ठाकरे की नौटंकी Drama King Udhdhav Thakre in Maharashtra

उद्धव की नौटंकी
अब हम इसे नौटंकी नहींकहेंगे तो क्या कहेंगे......महाराष्ट्र विधान सभाचुनाव २०१४ के पहले शिवसेना के मुखिया ने जिस तरह से बीजेपी से सीटों के बँटवारे लिए लड़े वो जग जाहिर है और चुनाव के बाद मोदी लहर पर सवार होकर लगभग ६० सीटें जीतकर ऐसे उछलने लगे जैसे की महाराष्ट्र की बपौती उन्ही के पास है ....मराठी मानुष की राजनीति करने वाले यह भूल गए की मुंबई के बाहर भी महाराष्ट्र की ऐसी भी जनता है जिसे इन सब बातों की परवाह नहीं , वह गरीब इसलिए है उसके पास खेती के साधन नहीं है , और अगर हैं भी तो उसकी फसल का कोई खरीदार नहीं .,,जिसके कारण वह अक्सर बिचौलियों के चंगुल में फंस जाता है और उसे गरीबी और कर्ज के चलते उसे अपनी जान तक से हाँथ धोना पड़ता है ...बीजेपी ने उद्धव की कोई शर्त न मानकर बहुत अच्छा ही किया...क्यूंकि अगर सुशाशन अगर देना है तो गठबंधन की राजनीति से ऊपर उठना पड़ेगा ....और बीजेपी ठीक वैसा ही कर रही है.....आईये पहले महाराष्ट्र के घटनाक्रमपर नज़र डाले और देखें वोटबैंक की राजनीती और सुशाशन की राजनीती में फरक क्या होता है --->
१. चुनाव से पहले उध्दव ने सीटों के बटवारे को लेकर बहुत जिद्दोजहद की लेकिन अमित शाह ने उनकी एक भी नहीं सुनी ,...कारण सिर्फ यही था की मोदी लहर पर सवार होकर शिव सेना अपने जीते हुए सीटों की संख्या बढ़ाना चाहती थी ताकि सरकार बनाने की स्थिति में अपनी मनमानी कर सके
२. शिवसेना से गठबंधन टूटनेके बाद बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और सिर्फ पंद्रह दिनों के अंदर अंदर मोदीजी और राजनाथ सिंह ने स्वयं  सर्वाधिक रैलियां की जिससे शिवसेनाको मिर्ची लग गयी क्यूंकि वो भी उसी लहर पर सवार थे
३. शिव सेना को मिर्ची तब और भी लगी जब बीजेपी ने शिव सेना के खिलाफ कुछ भी नहीं बोलने और बाला साहब ठाकरे के वजह से विरोध की राजनिति न करने का निर्णय किया...तब तो फिर सामना के जरिये मोदी के बाप तक को नहीं छोड़ा गया
४.चुनाव होने के बाद जब बीजेपी एक मात्र सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी तो शिवसेना सकते में पड़ गयी और फिर आत्मसम्मान की बात करने लगी
५. उद्धव जी का अहंकार यहाँ पर भी नहीं टूटा तो खुले आम भाजपा को समर्थन देने के लिए सौदेबाजी करने लगे, लेकिन जब इस पर भी बीजेपी नहीं राजी हुई तो फिर एनसीपी से समर्थन का आरोप भाजपा के सर मढने में तनिक देर भी नहीं लगायी ...
६. उद्धव को लगा बीजेपी पर महज दस सीटों के लिएद बाव बनाकर महाराष्ट्र के मंत्रिमंडल में  प्रमुख मंत्रिपद, जैसे रियल स्टेट , फाइनेंस इत्यादि पर कब्ज़ा कर लेंगे लेकिन बीजेपी ने सूझ बूझका परिचय देते हुए ऐसा नहीं किया और इस तरह से गठबंधन की राजनीती से भाजपा बच गयी साथ ही जनता के बीच भी अच्छा संदेश गया, और तो और बीजेपी के किसी भी नेता ने प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी रूप सेएनसीपी का समर्थन लेने की बात नहीं कही
७ और अब जब ध्वनि मत से बीजेपी सरकार को विश्वासमत प्राप्त हो गया तो चुनाव के बाद से सोयी हुई कांग्रेस को तगड़ा झटका लगा क्यूंकि उसने सोचा था की किसी भी हालत में शिव सेना बीजेपीको सरकार नहीं बनाने देगी....लेकिन हुआ उल्टा ....और शिव सेना भी इस बात से चिढगयी ....कोंग्रेसी तो इतना चिढ गए की स्पीकर की गाड़ी रोककर मारा पीटी भी कर बैठे और तीन साल तक के लिए ससपेंड भी हो गए
८. शिव सेना या कह ले की उध्दव ठाकरे इतना चिढ गए हैं की बैठक पर बैठक कर रहे हैं पर अफ़सोस..यह की अबछह महीने तक कुछ नहीं होसकता ...क्यूंकि संविधान के हिसाब से अब छह महीने के बाद ही सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जा सकता है
९ . अब रही बात वोटिंग कराने की ....तो आप यह जान लें की यह सबको पता था की ध्वनि मत से बीजेपी की ही सरकार बनेगी लेकिन किसी ने भी पहले यह नहीं कहा की वोटिंग के बिना हम सरकार का समर्थन नहीं करेंगे????क्यों ???क्यूंकि चाहे कांग्रेस हो, शिव सेना हो , या फिर एनसीपी ही हो सब पार्टियों में मोदी के प्रशंशक भरे पड़े है ...तो ऐसे में पार्टियों का मतभेद खुल के सामने आ जाता ....लेकिन अब वही पार्टियां इस बात को लेकर चिल्ला रही हैं की वोटिंग नहींहुई ...वोटिंग नहीं हुई जबकि वो खुद ही अंदर से इसके पक्षमें नहीं थी
और सबसे मजेदार बात यह है की अब महाराष्ट्र से दावूद कनेक्शन ख़त्म हो गया है(जैसा की मेरे पिछले लेख में यह बात कही जा चुकी है ) जिसकी वजह से सबसे ज्यादा तकलीफ दावूद के रिश्तेदारों यानी कांग्रेस को हुईहै ....यह बात भी सही है देवेन्द्र फड़नवीस के पास अभी बहुत बड़ी चुनौतियाँ है लेकिन ये सारी चुनौतियाँ सुशाशन के साथ धीरे धीरे ख़त्म होजाएँगी और महाराष्ट्र कीजनता को १५ साल के कुशाशन से मुक्ति और उसका इन्साफ मिल ही जायेगा