बुधवार, 27 मार्च 2013

क्या स्वभाव बदल सकते हैं ?? Can we change our Swabhav?

क्या स्वभाव बदल सकते हैं ??
"स्वभावस्तु प्रवर्तते" अर्थात सब प्राणियों का स्वभाव ही अपने आपसे आपमें बरत रहा है, इसके प्रवाह को रोक सकना संभव नहीं है। जैसे सिंह अपने स्वभाव से भूख लगने पर ही शिकार के लिए प्रेरित होता है और हिरन या अन्य जीव स्वभाव के चलते ही सिंह के आने पर अपनी रक्षा हेतु भाग खड़े होते हैं।
लेकिन मनुष्यों को ईश्वर ने बुध्दि और विवेक देकर हमें अन्य जीवित प्राणियों से भिन्न बनाया है। तात्पर्य यह की मनुष्य विषम से विषम परिस्थितियों में भी भग्वद-प्रदत्त बुद्धि और विवेक से उसका हल आसानी से निकाल सकते हैं। परन्तु इसके लिए स्वाभाव बदलने की आवश्यकता नहीं है। तो फिर बदलना क्या है? हमें अपने मन की भावना बदलनी है। कर्मों में आसक्ति , अनासक्ति और राग द्वेष को मिटाना होगा।
जैसे कोई कस्साई है जिसका स्वभाव प्रतिदिन अनेकानेक जीवों को मारना है। तो अगर कोई कहे की भाई तू अहिंसा छोड़ दे और भगवान् की शरण में आजा। तो ऐसा तो होने से रहा। उसका स्वभाव बार बार उसे वही करने पर प्रेरित करेगा जो की वह करता आया है। तब तो लोग कहेंगे अरे इसका तो उद्धार संभव हि नहीं क्योंकि इसका तो स्वभाव ही प्राणियों को मारना काटना है।

लेकिन प्रिय मित्रों ऐसा नहीं है, अगर वही कस्साई ईमानदारी से अपना व्यापार चलाये, मतलब की जितने की आवश्यकता हो उतना ही व्यवहार करे, धोका न दे, उचित मूल्य से ज्यादा न ले और अर्थात अपने कर्मों को करने में राग द्वेष न करे। किसी दिन कमाई न हो पाए तो उतने में संतुष्ट रहे। और ऐसा सभी कर सकते हैं।

आजकल लोग अक्सर पाप करते हैं और यह कहा करते हैं की क्या करें यार सब कुछ तो भगवान् ही करवा रहे हैं तो इसमे अपना बस कैसे चल सकते हैं। और ऐसा कह कर वो गलत काम करते हैं, अन्य प्राणियों का  छिनकर अपना पेट भरते हैं और पाप को ही खाते हैं। व्यापारी अक्सर यही कहा करते हैं की देखो भाई हम ईमानदारी से काम कैसे कर सकते हैं यह तो धंधा ही ऐसा है। टैक्स की चोरी करते समय लोग अक्सर यही कहते हैं। और यही पर हम और आप गलत करते और सोचते हैं।

हम चाहे जिस भी परिस्थिति में रहें भगवान् ने कहा है हमें धर्म का पालन करना चाहिए और यह धर्म क्या है? वह धर्म है परहित का।
परहित सरिस धर्म नहीं भाई। परपीड़ा सैम नहीं अधमाई।।
अर्थात आम लोगो का हित सोचना ही धर्म है और दूसरों को पीड़ा देना सबसे बड़ा अधर्म है। कुछ कहते हैं इससे हमें क्या मिलेगा। अच्छा भाई क्या हमें शांति नहीं चाहिए, क्या हमें दुखों और सुख से परे आनंद का अनुभव नहीं करना है, क्या हम दूसरों का हक़ मारकर सुख से रह पाएंगे।
वैज्ञानिक न्यूटन ने कहा है की हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। उसी तरह से जब भी हम कोई भी बात सोचते हैं तो एक तरंग उत्पन होती है और जिसके प्रतिक्रिया स्वरुप हमारे ऊपर उस सोची हुई बात का प्रभाव पड़ता है। सो अगर हम दूसरों के कल्याण की बात सोचेंगे तो वह एक न एक दिन जरुर हमारे पास लौट के आएगी। और अगर हमने अधर्म का आचरण किया तो यह विश्व-भावना रुपी प्रकृति हमें प्रतिक्रिया स्वरुप उसका फल अवश्य देगी।
सो मित्रों स्वभाव के अनुसार हमें जो भी करना प्राप्त हुआ है हमें उसे ही ईमानदारी से करना चाहिए। स्वाभाव बदलने की आवश्यकता नहीं है। जैसे एक ब्राह्मण अध्ययन अध्यापन करता है, क्षत्रिय युद्ध करके देश की रक्षा करता है, वैश्य व्यापार आदि करके देश को धन धन्य से परिपूरित करता है और शुद्र सबकी सेवा करता है। भगवान् ने इन्ही चार स्वाभाव के आधार पर वर्ण व्यवस्था बतायी है।

कभी कभी हम यह सोचते हैं, हम बड़े क्रोधी स्वाभाव के हैं, तो कैसे क्या करें ? इसके लिए मेरे विचार से उत्तम यही है यदि हमें क्रोध आता भी है तो हम उसे समाज के कल्याण में खर्च कर दे। जैसे की क्रोध हम अपने लिए न करके दुसरे के अधिकार और हक़ के लिए दिखाएं। क्रोध आने पर यह सोचे मुझे यह चीज़ अपने स्वार्थ के लिए नहीं करनी है। तब ऐसा करने से आप देखेंगे स्वयं आप अपने क्रोध पर नियंत्रण कर पा राहे हैं। कम से कम मेरा अनुभव तो यही कहता है।

इसी तरह से किसी भी क्षेत्र या अवस्था में हम धर्म का पालन कर सकते हैं। जैसे किसी को धन की बहुत लालच रहती है। दिन रात वो यही सोचे की कैसे धन बढे क्या करू कहाँ जाऊं की मेरी सम्पदा बढे? तो इसमें मेरे विचार से स्वाभाव बदलने की अपेक्षा अगर भावना बदल दें की हमें तो धन लोक कल्याण के लिए धन जुटाना है, लोगों को दान देना है और साथ ही साथ धन के साथ राग और द्वेष हटाकर उचित बुध्दि और विवेक से लोगों की सहायता करे तो उसकी धन के प्रति उसकी आसक्ति दिन प्रतिदिन अपने आप कम होती जाएगी।

हमसे गलती प्रायः यही होती है हम परहित भावना और बुद्धि विवेक पर बल देने के बजाय स्वाभाव परिवर्तित करने की ज्यादा कोशिश करते हैं। पल भर के लिए हम अपना स्वभाव बदल भी ले तो भी हम एक न एक दिन अनजाने में अपने स्वाभाव के अनुसार ही काम करेंगे। जैसे शेर के बच्चे को बकरी के बच्चे के साथ रखने पर भी शेर का बच्चा शेर ही रहता है। भले उसे कुछ दिन लगे की वो बकरी है लेकिन एक दिन वह खुद ही अपने स्वभाव से शिकार करके अपना पेट भरने लग जायेगा।

सारांश में यही कहा जा सकता है स्वभाव को बदलने की नहीं , उसे सुधारकर परहित करने की भावना बनायी जानी चाहिए और इसी में हमारे साथ साथ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का रहस्य छुपा है। ब्रह्माण्ड में सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना जीतनी बलवती होगी उतना ही हम स्वयं की शक्ति पहचान पाने में समर्थ हो सकेंगे।


बुधवार, 20 मार्च 2013

क्या आप आपने आपको भूल सकते हैं?- Can we forget ourselves?

आपको भी लगता होगा की यह क्या पागलों वाली बात है। लेकिन वास्तव में स्वयं को शांति अपने आप को भूल जाने पर ही मिला करती है। अब आप शायद यह सोच रहे होंगे की भला यह कैसे संभव है ? लेकिन दोस्तों रोजमर्रा के अनुभवों को यदि ध्यान से समझें तो यह बात सत्य प्रतीत होने लगती है।

आपको पता है जब कभी बिलकुल थके हों, सारा शरीर दर्द से भरा हो, तो लगता है बस कही बिस्तर मिले और लेट जायें। लेटते ही नींद आती है और हम सो जाते हैं। सोने पर हम सब कुछ भूल जाते हैं। यहाँ तक की नींद के दौरान हमें यह भी याद नहीं रहता कि हम कहाँ हैं और किस परिस्थिति में है और हमारे आस पास क्या हो रहा है और क्या हुआ? और जब हम इस बाहरी दुनिया और अपने मन बुध्दि और विचारों से भी दूर, कुछ देर सो लेते हैं तो हममें फिर से एक नयी चेतनता और उर्जा भर उठती है।  आखिर क्यूँ होता है ऐसा? अगर सोने का मतलब सिर्फ लेटना होता तो हमें आराम केवल बिस्तर पर लेटे रहने से ही हो जाता। लेकिन रात भर बिना नींद के लेटे रहने पर भी हमें वो आराम नहीं मिलता जो सोने अर्थात अपने आपको भूल जाने पर होता है।

ठीक इसी तरह से अगर हम अपने दैनिक जीवन में कोई ऐसा काम करते हों जिसमे की हम अपने आप को ही भूल जाएँ, तो उसके तुरंत बाद कैसी शांति मिलाती है। मेरा स्वयं का अनुभव यही बताता है। जैसे की मैं अपने ऑफिस में जिस दिन जितना खाली रहता हूँ और इधर -उधर की बात सोचता रहता हूँ, उस दिन शाम के वक़्त आने पर उतना ही थका हुआ और निराश महसूस करता हूँ। लेकिन जिस दिन मैंने बहुत काम किया और इतना किया की अपने आपको भूल गया, चाहे वो किसी भी वजह से किया हो। लेकिन उस दिन शाम के वक़्त घर लौटकर एक अजीब सा अच्छापन लगता है। और हम बड़े खुश होकर कहते हैं देखो आज मैंने कितना काम किया।

ठीक इसी तरह से जब एक प्रेमी व्यक्ति, अपनी प्रेमिका के पास पहुंचता है तो उसे उस पल भर में अपने आपको पूरी तरह से भूला कर उसे कितना अच्छा लगता है। परन्तु समस्या यह है की हम यह समझ बैठते हैं की हमें यह शांति और सुख का अनुभव उस वस्तु या व्यक्ति से मिलता है। जो की नहीं है। क्यूंकि अगर हमें किसी व्यक्ति या वस्तु से सुख या शांति मिलती तो ऐसा हमेशा होना चाहिए। प्रायः देखने में तो यही आता है की जब जब हम ऐसा सोचते हैं, तब तब हम भूल से अपने सुख और शांति को दुसरे से पैदा हुआ मानते हैं। और जब हमें यही सुख शांति नहीं मिलती तो हम उसी व्यक्ति और वस्तु को दोष देते हैं। हम यह कहते है पहले तो यह मुझे मानता था अब नहीं मानता। पहले यह वस्तु अच्छी थी अब नहीं। हम यह समझ ही नहीं पाते की हमें जो भी सुख या शांति मिल रही है या मिलती है वो अपने आपको भूला देने पर ही मिलती है। अपने बारे में न सोचकर दूसरों के लिए सोचने में ही वह राज छुपा हुआ है। जिंदगी का मजा,आनंद , किसी को अपना मानने में नहीं बल्कि आपने आपको दूसरों के लिए मानने में है।

दोस्तों, यह बात पूरा अनुभव का विषय है। जैसे की कुछ लोग होते हैं जो बहुत ही बहादुरी वाले करतब करते हैं और उससे उन्हें बड़ा आनंद मिलता है। बंजी जंपिंग, पैराशूट जंपिंग और वगैरह वगैरह। जब आप इतनी ऊंचाई से कूदते हैं तो उस समय डर और उत्साह  के कारण आप केवल और केवल यह देखते हैं की आप गिर रहे हैं। लेकिन इस दौरान आप कुछ पल के लिए आपने आपको भूल सा जाते हैं। और उसका आपको मजा मिलता है। लेकिन अगर आप अभ्यस्त हो जायेंगे तो आपको ऐसा मजा नहीं मिलता और आप फिर से नया कुछ करके वैसा ही आनंद पाना चाहते हैं।
जी हाँ मित्रों, हम हमेशा सुख शांति और आनंद की चाह में एक चीज़ को छोड़कर नयी चीज़ों को पकड़ते जाते हैं। लेकिन अफ़सोस अंत में हमें निराशा और दुःख  ही मिलता है। और हम इसी उलझन में पड़े पड़े सारी जिंदगी गुजार डालते हैं। हम यह नहीं समझ पाते की मजा दूसरों के लिए जीने में है, यानि अपने आपको भुला देने में है। हर पल हर छण, हमें सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना को बनाये रखना होगा। क्यूंकि जिंदगी को जीने और महान बनाने का तरीका यही है। इतिहास गवाह है की भारत में जितने भी महापुरुष और ज्ञानी हुए हैं उन सबने अपने आपको भूलकर संसार की सेवा की, दुखियों का दुःख अपना दुःख समझा, दूसरों के लिए अपने आप तक को मिटा डाला। आखिर उन्हें ऐसा कौन सा सुख और कौन सा आनंद मिला जो उन्हें ऐसा करने को प्रेरित करता होगा।

साथियों, अगर आप अनुभव को सच्चा ज्ञान समझते हैं तो यह बात समझाने में कठिनाई नहीं होगी।

अंततः भगवान् को अपने आप में देखना ध्यान है और दूसरों में भगवान् को देखना समस्त संसार की सेवा है। और इन दोनों ही तरीकों से हम अपने आप को भुलाने का प्रयास कर सकते हैं। और जब हम अपने आपको भूलते जायेंगे तो स्वयं की आत्म-शांति हमें न जाने क्या अनुभव करा दे।

मंगलवार, 12 मार्च 2013

धैर्य और बुद्धि - patience and Wit - How to make it Satvik, towards truth

धैर्य और बुद्धि 
धैर्य अर्थात धारण शक्ति। जब एक माँ अपने शिशु के रोने चिल्लाने और शरारत करने पर भी परेशान नहीं होती, जब एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी के बार बार प्रश्न करने पर क्रोध नहीं करता, जब एक पति अपनी पत्नी की सारी कटुता को झेल लेता है, तो यह सब धारण शक्ति के बलबूते ही होता है।

बुद्धि वह है, जो हमें अगला पिछला सब दिखा कर यह कहती है की देख तूने जो पहले किया था उससे तुझे यह दुःख हुआ था और अगर तूने अभी भी ऐसा किया तो तुझे फिर से वही दुःख होंगे। हम अपने बुद्धि का ही प्रयोग कर परीक्षा के समय ध्यान लगाकर पढ़ पाते हैं, यह बुद्धि ही है जो हमें हमेशा सही मार्ग पर चलने की सलाह हर पल, हर छड़ दिया करती है, यह बुद्धि ही है जो हमें दुसरे गरीब और असहाय लोगों की सेवा करने की ओर प्रेरित करती है।

अभी तक मैंने जिस बुद्धि और धारण शक्ति बात की वह सब सात्विक विचार धारा से बताई है। भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में इसी को तीन भागों में बाँट दिया है। सात्विकी, राजसी, तामसी।
सात्विकी बुध्दि अपना और समाज का कल्याण देखती है, राजसी में अपनी और अहंकार की मुख्यता को लेकर कार्य होते हैं और तामसी बुद्धि हमेशा दूसरों के विनाश बारे में सोचती है। ठीक इसी तरह से सात्विक धारण शक्ति वह है जो किसी उपकार करने के लिए धारण की जाती है। जैसे की एक अच्छा विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने हेतु ध्यान पूर्वक सारी बातों को सुनाता और समझाता है और अपने गुरु के क्रोध को भी सहन करता है। राजसी धारण शक्ति व्यभिचार में होती है। मुख में राम बगल में छूरी इसका सटीक अर्थ है। जैसे किसी व्यापारी द्वारा किसी को धोखे से फ़साने के लिए पहले तो उसकी हर बात को समझता और मानता है और बाद में धोखा दे देता है। तामसी धारण शक्ति वो है जो केवल दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए होती है। जैसे किसी से बदला लेने आग में जलते रहना और तब तक वैसे ही बने रहना और उसके लिए विभिन्न प्रकार के कष्ट सहन करना जब तक बदला पूरा न हो जाये, इत्यादि।

अब प्रश्न यह उठता है की हम जाने कैसे की हमारी बुद्धि और धृति कैसी है? इसे जानने के लिए हमे विवेक और वैराग्य का सहारा लेना पड़ेगा। विवेक से हमें यह पता चल जायेगा की हमारी बुद्धि सात्विकी है, राजसी है या तामसी। विवेक जाग्रत कैसे हो? इसका सरल उपाय धार्मिक ग्रंथों का मनन और अध्ययन है, गीता रामायण और वेदों को पढना और उसके अनुसार आचरण करने से हमारा विवेक जाग्रत हो जायेगा और हम अपनी बुध्दि का अच्छी तरह से सदुपयोग कर पाएंगे। और इस विचार और मनो भावना को धारण करने के ये हमें सात्विक धृति की बहुत आवश्यकता होगी। सात्विक धृति को पाने के लिए हमें वैराग्य की सहायता लेनी पड़ेगी। वैराग्य का मतलब यह नहीं हम सब चीज़ों को छोड़ दे, बल्कि वैराग्य वह है जो अपने लिए न सोचकर दूसरों की सोचे। मतलब यह की अगर आपके पास साधन हैं तो आप उसे दूसरों की सेवा में लगा दें। जितना हो सके अपने से पहले दूसरों की सहायता करें, दान दें , गरीब को भोजन दें, कोई मांगे तो उसको अपने हिसाब से जितना भी हो बिना किसी हिचक के उसको उसकी आवश्यकता की वस्तु दे दे। इस तरह से आपके अन्दर संसार के प्रति वैराग्य की भावना बनेगी जो की आपके भीतर सात्विकी धारण शक्ति को उत्पन्न कर के आपकी चंचल वृत्तियों को शांत कर देगी।

विवेक की सहायता से बुद्धि को सन्मार्ग पर ले जाएँ और इस भावना को दृढ बनाये रखने के लिए वैराग्य को अपनाएं। दूसरों की सच्ची और स्वार्थ रहित सेवा से अपने आप में वैराग्य स्वतः ही बनेगा।

मित्रों जब हम यह सात्विकी बुध्दि और धृति प्राप्त कर लेंगे तो हमे यह स्पष्ट अनुभव होगा की स्वयं अर्थात परमात्मा के इस  अंश को आने जाने वाले सुख दुःख मोहित नहीं कर सकते हैं। क्यूंकि तब हम सबमें होंगे और हम अपने आप में।

रविवार, 10 मार्च 2013

प्रश्न करो और उत्तर अनुभव करो- Ask Questions to yourself and experiance the answers

सत्य वही है जो स्वयं को अनुभव होता है या जिसे हम महसूस करते हैं। सत्य वह बिलकुल नहीं जो हमें इन्द्रियों के द्वारा दिखता है क्यूंकि इन्द्रियां भी इसी असत्य का अंश हैं। अगर हम अपनी इन्द्रियों के अनुभव को ही सत्य मानने लगेंगे तब तो हम वैज्ञानिक दृष्टि और अध्यात्मिक दृष्टि , दोनों से ही गलत होंगे। हम पृथ्वी को गोल के बजाय चपटा बोलेंगे जो की वैज्ञानिक रूप से गलत होगा और अगर जीवन के सुख दुखों में ही फंसे रहेंगे तो यह अध्यात्मिक दृष्टिसे अपने आपको अवनति में डालने के बराबर होगा। इसी कारण यदि हम अपने सारे स्वयं के अनुभवों को लेकर स्वयं की खोज करें तो हम वैज्ञानिक और अध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से उन्नति कर विश्व कल्याण और विश्व बंधुत्व की भावना को आत्मसात कर सकेंगे, और तब ही हम जान पाएंगे की हमारे ऋषि, मुनि और ज्ञानी महात्माओं ने जिस परमानन्द की बात की है, वो है क्या ? सो प्रश्न करो , और उत्तर अनुभव करो क्यूंकि अनुभव  ही सच्चा ज्ञान है। 

मंगलवार, 5 मार्च 2013

अनुभव की महत्ता को व्यर्थ न करें - Don't let your experiance be a waste

भगवान के मेरे साथ बने रहने की भावना मुझे हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है और दे रही है। जीवन में संबंधों को लेकर मनुष्य हमेशा दुःख पाता रहता है। इन सब से छुटकारा एक ही तरीक़ा है निःस्वार्थ भाव से सबकी सेवा करना , मन में कोई विषमता न रखना, और हमेशा आगे बढ़ने और समस्या के समाधान की और देखना ही हमें इन सब परिस्थितियों से उबार सकता है।
क्रोध से बचना, किसी को को बुरा नहीं कहना , किसी के प्रति वैमनस्य का भाव न रखना कितना कठिन प्रतीत होता है , वो भी तब ,जब कोई व्यक्ति अपने अहम् पर वार करता है या उन सिद्धांतो पर वार करता है जिन पर हमारे जीवन की आधार शिला खड़ी हो। नकारात्मक भावनाओ पर विजय पा लेना इतना सरल नहीं होता है। इसके लिए निरंतर प्रयास करना होता है। और मेरे विचार से प्रयास करना ही मानव जीवन का मूल उद्देश्य होना चाहिए, परिणाम की चिंता किये बगैर। परन्तु अगर सामने वाला व्यक्ति हमारी चीज़ों को न समझे तो। क्या भाग जाना चाहिए? क्या उसके प्रति उदासीन हो जाना चाहिए? क्या उन चीज़ों पर वाद विवाद करके लड़ना चाहिए? आखिर क्या करना चाहिए? मैं इन सब प्रश्नों के उत्तर को हर जगह क्यों ढूंढ रहा हूँ? मुझे गीता और रामायण में इन प्रश्नों के उत्तर क्यों नहीं मिलते? गीता में तो अर्जुन को युद्ध करने को कहते हैं और वो भी निःसंग होकर। कृष्ण जी ने कैसे कह दिया होगा जाओ और युद्ध करो। ये मत सोचो की जय होगी या पराजय। लेकिन यहाँ तो महाभारत अपने मन में ही चल रहा है। कभी हम ही कौरव हैं और कभी पांडव, कभी धर्म का पक्ष लेते हुए कभी अनजाने में अधर्म करके पश्चाताप से जलते हुए।

रामायण में तो राम जी ने पिता के कहने पर राज्य ही छोड़ दिया। फिर उन्होंने पिता का वचन निभाने के लिए किसी की नहीं सुनी। यहाँ  राज्य धर्म निभाने की लिए सीता का भी परित्याग कर दिया था।

हम हमेशा परिस्थितियों के दास हो जाते हैं और समझ में नहीं आता की हमारे साथ ऐसा क्यूँ। जब हम यह जानते हैं की ये सब समय, परिवेश ऐसा कभी भी एक जैसा नहीं रहेगा, न तो व्यक्ति रहेगा और न तो सम्बन्ध तो हम क्या कर सकते हैं जिससे हम विषम परिस्थितियों में भी अनिर्वचनीय शांति का मार्ग प्रशस्त कर सकें। कुल मिलाकर अच्छी बूरी परिस्थितियों से हम बच तो कदापि नहीं सकते परन्तु धैर्य पूर्वक पुरुषार्थ करके शान्ति का अनुभव कर सकते हैं।

अब हमारे सामने यही प्रश्न रह जाता है की इन सम-विषम परिस्थितियों का सदुपयोग कैसे करें। सुख का सबसे बड़ा सदुपयोग दूसरों की सेवा है। परन्तु दुःख में निष्काम कर्तव्य कर्म करते रहना ही उद्देश्य होना चाहिए। अगर दुःख प्राप्ति किसी व्यक्ति द्वारा आपको गलत सिद्ध करने पर हो रहा है तो क्या करें? कैसे हम अपने आपको सम्मोहित होने और क्रोधित होने से बचा सकते हैं? अगर सामने वाला आपको आपकी गलती को मानने को बाध्य करे तब क्या करें ?क्या करना चाहिए की सामने वाला व्यक्ति का क्रोध शांत हो जाये और वह संयमित होकर आपकी बातों का आदर करे?

सच तो यह है हम इस बात की गारंटी ले ही नहीं सकते की सामने वाला अपनी बात सुनेगा भी या नहीं। यह भी सच है हम जितना ही उसके सामने सच और धर्म पूर्वक बातों को उसके सामने कहते है और उसकी बातों का विरोध प्रकट करते हैं तो वह अनर्गल और बिना किसी आधार के, मूर्खतापूर्ण तर्क प्रस्तुत करता है। और यदि आप उसे परास्त भी कर लेते हैं तो भी उन बातों को न समझकर वह क्रोध करता है।

कुल मिला कर मुझे इतना समझ में आया की जिस चीज़ को जानते हुए भी हम कुछ नहीं कर सकते तो उसके विषय में चिंतित होना या उसके विषय में दुखी होना मुर्खता होगी। यह ठीक उसी तरह से है जैसे हम रोज़ समाचारों में कई सारी अच्छी बुरी खबर सुनते हैं परन्तु प्रायः हमें उनसे इतना कष्ट नहीं होता जितना उनकी खबरों से जिनको हम अपना मानते हैं या वे हमसे जुड़े हैं। लेकिन इसी बात में एक बहुत बड़ा रहस्य छुपा हुआ है जिसे प्रायः हम नज़रंदाज़ कर जाते हैं। वह महत्वपूर्ण बात यह है की हमें केवल अपनी वृत्तियों को शांत करने और रखने की कोशिश करनी चाहिए। हमें यह बिलकुल भूल ही जाना चाहिए वो हमारे लिए हैं, बल्कि यह सोचना है की हमें इसकी सेवा करनी है, और चाहे उसका मूल्य कुछ भी हो। परन्तु साथ ही साथ उनकी गलत बातों का मुखर विरोध भी करना चाहिए ताकि हमारे मन में अपने गलत होने की कुंठा न हो। प्रायः हम किसी को खुश रखने के लिए उसके सिद्धांतो को बाहर से सम्मति दे देते हैं परन्तु भीतर ही भीतर कुढ़ते रहते हैं। हमें इस चीज़ से बहार आना होगा और हमें जमकर अपनी बातों को रखना होगा,और साथ ही साथ अपनी गलतियों को भी स्वीकार करते हुए चलना होगा।

अब प्रश्न यह उठता है की हमें ये कैसे पता चले की हम कब गलत हैं कब सही। इसके लिए मेरे विचार से थोडा धैर्य चाहिए। अगर हम विपरीत परिस्थितियों में अपना धीरज न खोकर उद्वेलित ना हो तो शायद यह कर सकने में सक्षम हो सकते हैं। परन्तु यह इतना सरल नहीं। अगर हम कोई भी चीज़ करने से पहले से यह सोच ले और दृढ़ विश्वास कर ले की हमें केवल अपने आपको देखना है, अपनी सोच को बदलना है, अपने क्रोध को दबाकर नहीं परन्तु उचित व्यवहार, संयम और तर्कों से सामने वाले की बातों प्रत्युत्तर देना है। हमें अपना स्वभाव नहीं बदलना है परन्तु उसमे होने वाले राग और द्वेष की भावना से विमुक्त होना है। हमें यह देखना होगा की हम बिना क्रोध किये शांत रहकर सामने वाले की सारी बातों का उत्तर कैसे दे सकते हैं।

स्वयं के अनुभव से मुझे ज्ञात हुआ की जब भी हम कोई सन्देश या शिक्षा का वाक्य पढ़ते हैं तो हम तुरंत ही उसे दूसरों पर लागू कर देते हुए यही सोचते हैं इसने तो ऐसा नहीं किया इसलिए वह गलत है और मैं सही हूँ, मैं तो ऐसा करता हूँ, वो नहीं करता। उदाहरण के लिए अगर मैंने पढ़ा की "सच्चा प्रेम बांधकर नहीं बल्कि स्वतंत्र रखकर ही हो सकता है" तो उसी क्षण मैं यह सोचता हूँ की देखो , मैं तो उसे कितना प्यार करता हूँ, उसे स्वतंत्र रखता हूँ लेकिन फिर भी वो मुझे बांधकर रखता है, उसे यह बात नहीं समझ में आती कि सच्चा प्रेम स्वतंत्र रखकर होता है। लेकिन ऐसा सोचते ही हम यह भूल जाते हैं की यह वाक्य दुसरे से ज्यादा अपने पर लागू होता है क्यूंकि हमने इसे पढ़ा है। बाद में अगर मैं इसी वाक्य पर फिर से गहरी सांस लेने के बाद सोचता हूँ तो यह पता चलता है कि मुझे यह सोचना चाहिए की देखो मैंने ही उसे बांध कर रखा हुआ है, इसी वजह से वो मेरे प्यार को नहीं समझता है, आज से मुझे दृढ़ता पूर्वक इसका पालन करूंगा, मैं उसे अपने किसी भी सिद्धांत और विचारों को थोपने की कोशिश नहीं करूंगा परन्तु सत्य जरुर कहूँगा। जी हाँ, सत्य वही है जिसका अनुभव किया गया हो। इसीलिए अनुभव किये हुए विचारों को कहने में कभी भी नहीं डरना चाहिए। जाहिर है सत्य की राह पर विपत्तियाँ भी बहुत आएँगी लेकिन उसमे पूरी तरह संयम और धैर्य रखकर उसे स्वीकार करना चाहिए। स्वीकार करने का यह मतलब बिलकुल नहीं की हम हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाएँ और अकर्मण्य बन जाए। हमें उचित कर्म और कर्तव्यों को करते हुए उस विपत्ति को स्वीकार करना चाहिए। भागना नहीं चाहिए।   
कुल मिलाकर अगर हमें किसी भी समय किसी का दोष दिखे तो तुरंत ही यह चेक कर लेना चाहिए की कहीं यह दोष मेरे में तो नहीं, तुरंत ही यह सोचना चाहिए अगर मैं ऐसा करूंगा तो सामने वाले को दुःख होता होगा, आज से मैं ऐसा नहीं करूँगा। ऐसा सोचते हमें शांति मिलेगी लेकिन अगर हमने सामने वाले की बुराइयों को देखना शुरू किया तो हम अशांत हो जायेंगे, क्रोधित हो जायेंगे, और क्रोध में सम्मोहित हो कर कुछ न कुछ ऐसा कर ही बैठेंगे जिनसे बाद में हमे पश्चाताप करना पड़ेगा। अब फैसला हमें ही करना होगा की हम दूसरों की बुराइयों, अवगुणों  कमियों को देख कर क्रोध और पश्चाताप से जलने के बजाय हम उन्ही चीज़ों से अपना आत्म निरक्षण करके शांति और एकचित्तता का मार्ग प्रशस्त करें। एक कहावत है "तुम जितने पत्थर फेकोंगे हम उनसे ही अपनी मंजिल का रास्ता बना लेंगे"। यह बात सच भी है। लेकिन अगर हम यही पत्थर उल्टा दूसरों पर फेकेंगे तो हम वहीं के वहीं के रह जायेंगे। 

संत कबीर दास जी ने बिल्कुल सही बात कही है कि अपने निंदको को अपने पास रखना चाहिये ताकि आप अपने ख़ुद के दोषों का सुधार कर सकें।

"निंदक निअरे राखिये, आँगन कुटी छवाय।"

सारांश में बस इतना ही कहा जा सकता है अच्छा और बुरा समय तो आता जाता रहेगा, उसे हम रोक नहीं सकते हैं। ऐसा सोचकर हम भूल करते हैं की हम अपने प्रयत्न से , कोशिश से अच्छा समय ला सकते हैं और बुरा समय दूर कर सकते हैं। हमारा अनुभव ऐसा नहीं कहता। और अपने अनुभव को महत्व न देना मतलब आप सच्चाई को समझ नहीं रहे हैं।
दूसरी बात जब भी हमें जब भी किसी व्यक्ति विशेष से कष्ट हो, दुःख हो, तो उसी पल हमें अपना आत्म निरीक्षण शुरू कर देना चाहिए की कहीं ये अपने में तो नहीं। ऐसा करके आप अपने आपको सम्हाल पाएंगे अन्यथा आपके आप उनपर और वो आपपर पत्थर फेंकते  ही रह जायेंगे और चोट आपको भी लगेगी और सामने वाला भी आपको नहीं समझ पायेगा। और दूरियां बढाती जाएँगी। कुल मिलाकर फैसला आपको ही करना पड़ेगा।

अंततः ये बातें पढ़ने समझने और करने में कठिन हो सकती हैं लेकिन इनका अनुभव करना उतना ही सरल है जितना की एक नवजात शिशु के लिए अपनी माँ को पहचानना।