क्या स्वभाव बदल सकते हैं ??
"स्वभावस्तु प्रवर्तते" अर्थात सब प्राणियों का स्वभाव ही अपने आपसे आपमें बरत रहा है, इसके प्रवाह को रोक सकना संभव नहीं है। जैसे सिंह अपने स्वभाव से भूख लगने पर ही शिकार के लिए प्रेरित होता है और हिरन या अन्य जीव स्वभाव के चलते ही सिंह के आने पर अपनी रक्षा हेतु भाग खड़े होते हैं।
लेकिन मनुष्यों को ईश्वर ने बुध्दि और विवेक देकर हमें अन्य जीवित प्राणियों से भिन्न बनाया है। तात्पर्य यह की मनुष्य विषम से विषम परिस्थितियों में भी भग्वद-प्रदत्त बुद्धि और विवेक से उसका हल आसानी से निकाल सकते हैं। परन्तु इसके लिए स्वाभाव बदलने की आवश्यकता नहीं है। तो फिर बदलना क्या है? हमें अपने मन की भावना बदलनी है। कर्मों में आसक्ति , अनासक्ति और राग द्वेष को मिटाना होगा।
जैसे कोई कस्साई है जिसका स्वभाव प्रतिदिन अनेकानेक जीवों को मारना है। तो अगर कोई कहे की भाई तू अहिंसा छोड़ दे और भगवान् की शरण में आजा। तो ऐसा तो होने से रहा। उसका स्वभाव बार बार उसे वही करने पर प्रेरित करेगा जो की वह करता आया है। तब तो लोग कहेंगे अरे इसका तो उद्धार संभव हि नहीं क्योंकि इसका तो स्वभाव ही प्राणियों को मारना काटना है।
लेकिन प्रिय मित्रों ऐसा नहीं है, अगर वही कस्साई ईमानदारी से अपना व्यापार चलाये, मतलब की जितने की आवश्यकता हो उतना ही व्यवहार करे, धोका न दे, उचित मूल्य से ज्यादा न ले और अर्थात अपने कर्मों को करने में राग द्वेष न करे। किसी दिन कमाई न हो पाए तो उतने में संतुष्ट रहे। और ऐसा सभी कर सकते हैं।
आजकल लोग अक्सर पाप करते हैं और यह कहा करते हैं की क्या करें यार सब कुछ तो भगवान् ही करवा रहे हैं तो इसमे अपना बस कैसे चल सकते हैं। और ऐसा कह कर वो गलत काम करते हैं, अन्य प्राणियों का छिनकर अपना पेट भरते हैं और पाप को ही खाते हैं। व्यापारी अक्सर यही कहा करते हैं की देखो भाई हम ईमानदारी से काम कैसे कर सकते हैं यह तो धंधा ही ऐसा है। टैक्स की चोरी करते समय लोग अक्सर यही कहते हैं। और यही पर हम और आप गलत करते और सोचते हैं।
हम चाहे जिस भी परिस्थिति में रहें भगवान् ने कहा है हमें धर्म का पालन करना चाहिए और यह धर्म क्या है? वह धर्म है परहित का।
परहित सरिस धर्म नहीं भाई। परपीड़ा सैम नहीं अधमाई।।
अर्थात आम लोगो का हित सोचना ही धर्म है और दूसरों को पीड़ा देना सबसे बड़ा अधर्म है। कुछ कहते हैं इससे हमें क्या मिलेगा। अच्छा भाई क्या हमें शांति नहीं चाहिए, क्या हमें दुखों और सुख से परे आनंद का अनुभव नहीं करना है, क्या हम दूसरों का हक़ मारकर सुख से रह पाएंगे।
वैज्ञानिक न्यूटन ने कहा है की हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। उसी तरह से जब भी हम कोई भी बात सोचते हैं तो एक तरंग उत्पन होती है और जिसके प्रतिक्रिया स्वरुप हमारे ऊपर उस सोची हुई बात का प्रभाव पड़ता है। सो अगर हम दूसरों के कल्याण की बात सोचेंगे तो वह एक न एक दिन जरुर हमारे पास लौट के आएगी। और अगर हमने अधर्म का आचरण किया तो यह विश्व-भावना रुपी प्रकृति हमें प्रतिक्रिया स्वरुप उसका फल अवश्य देगी।
सो मित्रों स्वभाव के अनुसार हमें जो भी करना प्राप्त हुआ है हमें उसे ही ईमानदारी से करना चाहिए। स्वाभाव बदलने की आवश्यकता नहीं है। जैसे एक ब्राह्मण अध्ययन अध्यापन करता है, क्षत्रिय युद्ध करके देश की रक्षा करता है, वैश्य व्यापार आदि करके देश को धन धन्य से परिपूरित करता है और शुद्र सबकी सेवा करता है। भगवान् ने इन्ही चार स्वाभाव के आधार पर वर्ण व्यवस्था बतायी है।
कभी कभी हम यह सोचते हैं, हम बड़े क्रोधी स्वाभाव के हैं, तो कैसे क्या करें ? इसके लिए मेरे विचार से उत्तम यही है यदि हमें क्रोध आता भी है तो हम उसे समाज के कल्याण में खर्च कर दे। जैसे की क्रोध हम अपने लिए न करके दुसरे के अधिकार और हक़ के लिए दिखाएं। क्रोध आने पर यह सोचे मुझे यह चीज़ अपने स्वार्थ के लिए नहीं करनी है। तब ऐसा करने से आप देखेंगे स्वयं आप अपने क्रोध पर नियंत्रण कर पा राहे हैं। कम से कम मेरा अनुभव तो यही कहता है।
इसी तरह से किसी भी क्षेत्र या अवस्था में हम धर्म का पालन कर सकते हैं। जैसे किसी को धन की बहुत लालच रहती है। दिन रात वो यही सोचे की कैसे धन बढे क्या करू कहाँ जाऊं की मेरी सम्पदा बढे? तो इसमें मेरे विचार से स्वाभाव बदलने की अपेक्षा अगर भावना बदल दें की हमें तो धन लोक कल्याण के लिए धन जुटाना है, लोगों को दान देना है और साथ ही साथ धन के साथ राग और द्वेष हटाकर उचित बुध्दि और विवेक से लोगों की सहायता करे तो उसकी धन के प्रति उसकी आसक्ति दिन प्रतिदिन अपने आप कम होती जाएगी।
हमसे गलती प्रायः यही होती है हम परहित भावना और बुद्धि विवेक पर बल देने के बजाय स्वाभाव परिवर्तित करने की ज्यादा कोशिश करते हैं। पल भर के लिए हम अपना स्वभाव बदल भी ले तो भी हम एक न एक दिन अनजाने में अपने स्वाभाव के अनुसार ही काम करेंगे। जैसे शेर के बच्चे को बकरी के बच्चे के साथ रखने पर भी शेर का बच्चा शेर ही रहता है। भले उसे कुछ दिन लगे की वो बकरी है लेकिन एक दिन वह खुद ही अपने स्वभाव से शिकार करके अपना पेट भरने लग जायेगा।
सारांश में यही कहा जा सकता है स्वभाव को बदलने की नहीं , उसे सुधारकर परहित करने की भावना बनायी जानी चाहिए और इसी में हमारे साथ साथ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का रहस्य छुपा है। ब्रह्माण्ड में सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना जीतनी बलवती होगी उतना ही हम स्वयं की शक्ति पहचान पाने में समर्थ हो सकेंगे।
"स्वभावस्तु प्रवर्तते" अर्थात सब प्राणियों का स्वभाव ही अपने आपसे आपमें बरत रहा है, इसके प्रवाह को रोक सकना संभव नहीं है। जैसे सिंह अपने स्वभाव से भूख लगने पर ही शिकार के लिए प्रेरित होता है और हिरन या अन्य जीव स्वभाव के चलते ही सिंह के आने पर अपनी रक्षा हेतु भाग खड़े होते हैं।
लेकिन मनुष्यों को ईश्वर ने बुध्दि और विवेक देकर हमें अन्य जीवित प्राणियों से भिन्न बनाया है। तात्पर्य यह की मनुष्य विषम से विषम परिस्थितियों में भी भग्वद-प्रदत्त बुद्धि और विवेक से उसका हल आसानी से निकाल सकते हैं। परन्तु इसके लिए स्वाभाव बदलने की आवश्यकता नहीं है। तो फिर बदलना क्या है? हमें अपने मन की भावना बदलनी है। कर्मों में आसक्ति , अनासक्ति और राग द्वेष को मिटाना होगा।
जैसे कोई कस्साई है जिसका स्वभाव प्रतिदिन अनेकानेक जीवों को मारना है। तो अगर कोई कहे की भाई तू अहिंसा छोड़ दे और भगवान् की शरण में आजा। तो ऐसा तो होने से रहा। उसका स्वभाव बार बार उसे वही करने पर प्रेरित करेगा जो की वह करता आया है। तब तो लोग कहेंगे अरे इसका तो उद्धार संभव हि नहीं क्योंकि इसका तो स्वभाव ही प्राणियों को मारना काटना है।
लेकिन प्रिय मित्रों ऐसा नहीं है, अगर वही कस्साई ईमानदारी से अपना व्यापार चलाये, मतलब की जितने की आवश्यकता हो उतना ही व्यवहार करे, धोका न दे, उचित मूल्य से ज्यादा न ले और अर्थात अपने कर्मों को करने में राग द्वेष न करे। किसी दिन कमाई न हो पाए तो उतने में संतुष्ट रहे। और ऐसा सभी कर सकते हैं।
आजकल लोग अक्सर पाप करते हैं और यह कहा करते हैं की क्या करें यार सब कुछ तो भगवान् ही करवा रहे हैं तो इसमे अपना बस कैसे चल सकते हैं। और ऐसा कह कर वो गलत काम करते हैं, अन्य प्राणियों का छिनकर अपना पेट भरते हैं और पाप को ही खाते हैं। व्यापारी अक्सर यही कहा करते हैं की देखो भाई हम ईमानदारी से काम कैसे कर सकते हैं यह तो धंधा ही ऐसा है। टैक्स की चोरी करते समय लोग अक्सर यही कहते हैं। और यही पर हम और आप गलत करते और सोचते हैं।
हम चाहे जिस भी परिस्थिति में रहें भगवान् ने कहा है हमें धर्म का पालन करना चाहिए और यह धर्म क्या है? वह धर्म है परहित का।
परहित सरिस धर्म नहीं भाई। परपीड़ा सैम नहीं अधमाई।।
अर्थात आम लोगो का हित सोचना ही धर्म है और दूसरों को पीड़ा देना सबसे बड़ा अधर्म है। कुछ कहते हैं इससे हमें क्या मिलेगा। अच्छा भाई क्या हमें शांति नहीं चाहिए, क्या हमें दुखों और सुख से परे आनंद का अनुभव नहीं करना है, क्या हम दूसरों का हक़ मारकर सुख से रह पाएंगे।
वैज्ञानिक न्यूटन ने कहा है की हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। उसी तरह से जब भी हम कोई भी बात सोचते हैं तो एक तरंग उत्पन होती है और जिसके प्रतिक्रिया स्वरुप हमारे ऊपर उस सोची हुई बात का प्रभाव पड़ता है। सो अगर हम दूसरों के कल्याण की बात सोचेंगे तो वह एक न एक दिन जरुर हमारे पास लौट के आएगी। और अगर हमने अधर्म का आचरण किया तो यह विश्व-भावना रुपी प्रकृति हमें प्रतिक्रिया स्वरुप उसका फल अवश्य देगी।
सो मित्रों स्वभाव के अनुसार हमें जो भी करना प्राप्त हुआ है हमें उसे ही ईमानदारी से करना चाहिए। स्वाभाव बदलने की आवश्यकता नहीं है। जैसे एक ब्राह्मण अध्ययन अध्यापन करता है, क्षत्रिय युद्ध करके देश की रक्षा करता है, वैश्य व्यापार आदि करके देश को धन धन्य से परिपूरित करता है और शुद्र सबकी सेवा करता है। भगवान् ने इन्ही चार स्वाभाव के आधार पर वर्ण व्यवस्था बतायी है।
कभी कभी हम यह सोचते हैं, हम बड़े क्रोधी स्वाभाव के हैं, तो कैसे क्या करें ? इसके लिए मेरे विचार से उत्तम यही है यदि हमें क्रोध आता भी है तो हम उसे समाज के कल्याण में खर्च कर दे। जैसे की क्रोध हम अपने लिए न करके दुसरे के अधिकार और हक़ के लिए दिखाएं। क्रोध आने पर यह सोचे मुझे यह चीज़ अपने स्वार्थ के लिए नहीं करनी है। तब ऐसा करने से आप देखेंगे स्वयं आप अपने क्रोध पर नियंत्रण कर पा राहे हैं। कम से कम मेरा अनुभव तो यही कहता है।
इसी तरह से किसी भी क्षेत्र या अवस्था में हम धर्म का पालन कर सकते हैं। जैसे किसी को धन की बहुत लालच रहती है। दिन रात वो यही सोचे की कैसे धन बढे क्या करू कहाँ जाऊं की मेरी सम्पदा बढे? तो इसमें मेरे विचार से स्वाभाव बदलने की अपेक्षा अगर भावना बदल दें की हमें तो धन लोक कल्याण के लिए धन जुटाना है, लोगों को दान देना है और साथ ही साथ धन के साथ राग और द्वेष हटाकर उचित बुध्दि और विवेक से लोगों की सहायता करे तो उसकी धन के प्रति उसकी आसक्ति दिन प्रतिदिन अपने आप कम होती जाएगी।
हमसे गलती प्रायः यही होती है हम परहित भावना और बुद्धि विवेक पर बल देने के बजाय स्वाभाव परिवर्तित करने की ज्यादा कोशिश करते हैं। पल भर के लिए हम अपना स्वभाव बदल भी ले तो भी हम एक न एक दिन अनजाने में अपने स्वाभाव के अनुसार ही काम करेंगे। जैसे शेर के बच्चे को बकरी के बच्चे के साथ रखने पर भी शेर का बच्चा शेर ही रहता है। भले उसे कुछ दिन लगे की वो बकरी है लेकिन एक दिन वह खुद ही अपने स्वभाव से शिकार करके अपना पेट भरने लग जायेगा।
सारांश में यही कहा जा सकता है स्वभाव को बदलने की नहीं , उसे सुधारकर परहित करने की भावना बनायी जानी चाहिए और इसी में हमारे साथ साथ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण का रहस्य छुपा है। ब्रह्माण्ड में सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना जीतनी बलवती होगी उतना ही हम स्वयं की शक्ति पहचान पाने में समर्थ हो सकेंगे।