धैर्य और बुद्धि
धैर्य अर्थात धारण शक्ति। जब एक माँ अपने शिशु के रोने चिल्लाने और शरारत करने पर भी परेशान नहीं होती, जब एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी के बार बार प्रश्न करने पर क्रोध नहीं करता, जब एक पति अपनी पत्नी की सारी कटुता को झेल लेता है, तो यह सब धारण शक्ति के बलबूते ही होता है।
बुद्धि वह है, जो हमें अगला पिछला सब दिखा कर यह कहती है की देख तूने जो पहले किया था उससे तुझे यह दुःख हुआ था और अगर तूने अभी भी ऐसा किया तो तुझे फिर से वही दुःख होंगे। हम अपने बुद्धि का ही प्रयोग कर परीक्षा के समय ध्यान लगाकर पढ़ पाते हैं, यह बुद्धि ही है जो हमें हमेशा सही मार्ग पर चलने की सलाह हर पल, हर छड़ दिया करती है, यह बुद्धि ही है जो हमें दुसरे गरीब और असहाय लोगों की सेवा करने की ओर प्रेरित करती है।
अभी तक मैंने जिस बुद्धि और धारण शक्ति बात की वह सब सात्विक विचार धारा से बताई है। भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में इसी को तीन भागों में बाँट दिया है। सात्विकी, राजसी, तामसी।
सात्विकी बुध्दि अपना और समाज का कल्याण देखती है, राजसी में अपनी और अहंकार की मुख्यता को लेकर कार्य होते हैं और तामसी बुद्धि हमेशा दूसरों के विनाश बारे में सोचती है। ठीक इसी तरह से सात्विक धारण शक्ति वह है जो किसी उपकार करने के लिए धारण की जाती है। जैसे की एक अच्छा विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने हेतु ध्यान पूर्वक सारी बातों को सुनाता और समझाता है और अपने गुरु के क्रोध को भी सहन करता है। राजसी धारण शक्ति व्यभिचार में होती है। मुख में राम बगल में छूरी इसका सटीक अर्थ है। जैसे किसी व्यापारी द्वारा किसी को धोखे से फ़साने के लिए पहले तो उसकी हर बात को समझता और मानता है और बाद में धोखा दे देता है। तामसी धारण शक्ति वो है जो केवल दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए होती है। जैसे किसी से बदला लेने आग में जलते रहना और तब तक वैसे ही बने रहना और उसके लिए विभिन्न प्रकार के कष्ट सहन करना जब तक बदला पूरा न हो जाये, इत्यादि।
अब प्रश्न यह उठता है की हम जाने कैसे की हमारी बुद्धि और धृति कैसी है? इसे जानने के लिए हमे विवेक और वैराग्य का सहारा लेना पड़ेगा। विवेक से हमें यह पता चल जायेगा की हमारी बुद्धि सात्विकी है, राजसी है या तामसी। विवेक जाग्रत कैसे हो? इसका सरल उपाय धार्मिक ग्रंथों का मनन और अध्ययन है, गीता रामायण और वेदों को पढना और उसके अनुसार आचरण करने से हमारा विवेक जाग्रत हो जायेगा और हम अपनी बुध्दि का अच्छी तरह से सदुपयोग कर पाएंगे। और इस विचार और मनो भावना को धारण करने के ये हमें सात्विक धृति की बहुत आवश्यकता होगी। सात्विक धृति को पाने के लिए हमें वैराग्य की सहायता लेनी पड़ेगी। वैराग्य का मतलब यह नहीं हम सब चीज़ों को छोड़ दे, बल्कि वैराग्य वह है जो अपने लिए न सोचकर दूसरों की सोचे। मतलब यह की अगर आपके पास साधन हैं तो आप उसे दूसरों की सेवा में लगा दें। जितना हो सके अपने से पहले दूसरों की सहायता करें, दान दें , गरीब को भोजन दें, कोई मांगे तो उसको अपने हिसाब से जितना भी हो बिना किसी हिचक के उसको उसकी आवश्यकता की वस्तु दे दे। इस तरह से आपके अन्दर संसार के प्रति वैराग्य की भावना बनेगी जो की आपके भीतर सात्विकी धारण शक्ति को उत्पन्न कर के आपकी चंचल वृत्तियों को शांत कर देगी।
विवेक की सहायता से बुद्धि को सन्मार्ग पर ले जाएँ और इस भावना को दृढ बनाये रखने के लिए वैराग्य को अपनाएं। दूसरों की सच्ची और स्वार्थ रहित सेवा से अपने आप में वैराग्य स्वतः ही बनेगा।
मित्रों जब हम यह सात्विकी बुध्दि और धृति प्राप्त कर लेंगे तो हमे यह स्पष्ट अनुभव होगा की स्वयं अर्थात परमात्मा के इस अंश को आने जाने वाले सुख दुःख मोहित नहीं कर सकते हैं। क्यूंकि तब हम सबमें होंगे और हम अपने आप में।
धैर्य अर्थात धारण शक्ति। जब एक माँ अपने शिशु के रोने चिल्लाने और शरारत करने पर भी परेशान नहीं होती, जब एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी के बार बार प्रश्न करने पर क्रोध नहीं करता, जब एक पति अपनी पत्नी की सारी कटुता को झेल लेता है, तो यह सब धारण शक्ति के बलबूते ही होता है।
बुद्धि वह है, जो हमें अगला पिछला सब दिखा कर यह कहती है की देख तूने जो पहले किया था उससे तुझे यह दुःख हुआ था और अगर तूने अभी भी ऐसा किया तो तुझे फिर से वही दुःख होंगे। हम अपने बुद्धि का ही प्रयोग कर परीक्षा के समय ध्यान लगाकर पढ़ पाते हैं, यह बुद्धि ही है जो हमें हमेशा सही मार्ग पर चलने की सलाह हर पल, हर छड़ दिया करती है, यह बुद्धि ही है जो हमें दुसरे गरीब और असहाय लोगों की सेवा करने की ओर प्रेरित करती है।
अभी तक मैंने जिस बुद्धि और धारण शक्ति बात की वह सब सात्विक विचार धारा से बताई है। भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में इसी को तीन भागों में बाँट दिया है। सात्विकी, राजसी, तामसी।
सात्विकी बुध्दि अपना और समाज का कल्याण देखती है, राजसी में अपनी और अहंकार की मुख्यता को लेकर कार्य होते हैं और तामसी बुद्धि हमेशा दूसरों के विनाश बारे में सोचती है। ठीक इसी तरह से सात्विक धारण शक्ति वह है जो किसी उपकार करने के लिए धारण की जाती है। जैसे की एक अच्छा विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने हेतु ध्यान पूर्वक सारी बातों को सुनाता और समझाता है और अपने गुरु के क्रोध को भी सहन करता है। राजसी धारण शक्ति व्यभिचार में होती है। मुख में राम बगल में छूरी इसका सटीक अर्थ है। जैसे किसी व्यापारी द्वारा किसी को धोखे से फ़साने के लिए पहले तो उसकी हर बात को समझता और मानता है और बाद में धोखा दे देता है। तामसी धारण शक्ति वो है जो केवल दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए होती है। जैसे किसी से बदला लेने आग में जलते रहना और तब तक वैसे ही बने रहना और उसके लिए विभिन्न प्रकार के कष्ट सहन करना जब तक बदला पूरा न हो जाये, इत्यादि।
अब प्रश्न यह उठता है की हम जाने कैसे की हमारी बुद्धि और धृति कैसी है? इसे जानने के लिए हमे विवेक और वैराग्य का सहारा लेना पड़ेगा। विवेक से हमें यह पता चल जायेगा की हमारी बुद्धि सात्विकी है, राजसी है या तामसी। विवेक जाग्रत कैसे हो? इसका सरल उपाय धार्मिक ग्रंथों का मनन और अध्ययन है, गीता रामायण और वेदों को पढना और उसके अनुसार आचरण करने से हमारा विवेक जाग्रत हो जायेगा और हम अपनी बुध्दि का अच्छी तरह से सदुपयोग कर पाएंगे। और इस विचार और मनो भावना को धारण करने के ये हमें सात्विक धृति की बहुत आवश्यकता होगी। सात्विक धृति को पाने के लिए हमें वैराग्य की सहायता लेनी पड़ेगी। वैराग्य का मतलब यह नहीं हम सब चीज़ों को छोड़ दे, बल्कि वैराग्य वह है जो अपने लिए न सोचकर दूसरों की सोचे। मतलब यह की अगर आपके पास साधन हैं तो आप उसे दूसरों की सेवा में लगा दें। जितना हो सके अपने से पहले दूसरों की सहायता करें, दान दें , गरीब को भोजन दें, कोई मांगे तो उसको अपने हिसाब से जितना भी हो बिना किसी हिचक के उसको उसकी आवश्यकता की वस्तु दे दे। इस तरह से आपके अन्दर संसार के प्रति वैराग्य की भावना बनेगी जो की आपके भीतर सात्विकी धारण शक्ति को उत्पन्न कर के आपकी चंचल वृत्तियों को शांत कर देगी।
विवेक की सहायता से बुद्धि को सन्मार्ग पर ले जाएँ और इस भावना को दृढ बनाये रखने के लिए वैराग्य को अपनाएं। दूसरों की सच्ची और स्वार्थ रहित सेवा से अपने आप में वैराग्य स्वतः ही बनेगा।
मित्रों जब हम यह सात्विकी बुध्दि और धृति प्राप्त कर लेंगे तो हमे यह स्पष्ट अनुभव होगा की स्वयं अर्थात परमात्मा के इस अंश को आने जाने वाले सुख दुःख मोहित नहीं कर सकते हैं। क्यूंकि तब हम सबमें होंगे और हम अपने आप में।
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