क्या हम सुख दुःख से परे हो सकते हैं ???
मैं जब छोटा था और जब भी किसी रिश्तेदार के यहाँ जाता था तो कुछ ही दिनों में न जाएं कितनी आत्मीयता उमड़ पड़ती थी और लगता था बस अब यही समय ठहर जाये और हम इसी तरह खुश रहे। लेकिन समय तो बहता ही रहता है और उस समय विछोह की घडी में न जाने कितना दारुण दुःख होता था। जब थोडा बड़ा हुआ, तो अपने करीबी मित्रों की छोटी से छोटी बात का भी न जाने क्या क्या मतलब निकाल कर दुखी रहते थे और कुछ ही पलों के बाद गलतियों का अहसास होते ही लगता था की अब तो हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे। लेकिन समय के थपेड़ो ने उनको भी चकनाचूर किया। नौकरी मिलाने के बाद जब थोडा प्रोफेसनल बने तो अपने ही दोस्तों की इनकम बढ़ते देख और भी कष्ट होता और दिन रात यही धुन लगी रहती की कैसे आगे बढ़ जाएँ। इसी समय किसी से प्यार होना न जाने कितने सपने जग देता है और उन सपनों से जगाते भी देर नहीं होती। ध्यान आते ही लगता है की जीवन में अब कुछ नहीं बचा है और अब कैसे इन बातों से छुटकारा पाऊँ। लेकिन सोच विचार पीछा नहीं छोड़ते। वो तो बस धुन मारके इतने पीछे पड़ जाते हैं की पूरा जीवन रसहीन और विषाक्त लगाने लगता है। परन्तु समय बहता है और नयी उमंग नए जोश के साथ फिर बढ़ता है। दांपत्य जीवन के बाद अपने जीवन साथी के सारे सुख और दुःख का दायित्व लेते ही लगता है की हम कहा फंस गए।
परन्तु मित्रों अगर आप मेरी ध्यान से सोचेंगे तभी आप मेरी बात समझ पायेंगे की मैं क्या कहना चाहता हूँ। मैं न तो यहाँ कर्तव्य की बात करता हूँ और न आदर्शों की, बल्कि मेरी बात इससे इतर मेरे अनुभवों की है। आज जब भी मैं सोचता हूँ तो मैं यही पाता हूँ की समय के साथ केवल परिस्थितियां बदलती हैं हम नहीं। अगर हम बदल जाते तो हमें यह नहीं पता चल पता की वास्तव में हम ऐसे ना जाने कितने ही सुखों और दुखों को छोड़ आये हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे की अगर हम किसी बस स्टॉप पर बैठे हैं और बहुत सारी गाड़ियों को आते जाते हुए देखते हैं। परन्तु अगर हम किसी एक पर भी सवार होकर चले गए तो हम ये कभी नहीं जान पाएंगे की कौन कौन सी गाड़ियाँ गुजर गयीं हैं। मेरे विचार से किसी व्यक्ति को सदमा लगना एक ऐसी ही स्थिति है जब मनुष्य एक ही ख्याल और सोच को लेकर बैठा रहता है परन्तु उसकी स्थिति ठीक होते ही उसे अपनी वास्तविक अवस्था का ज्ञात हो जाता है।
जी हाँ दोस्तों मैं उसी वास्तविक और सहज अवस्था की बात कर रहा हूँ जो सुख और दुःख को मात्र आने जाने वाली गाड़ियाँ मानता है। और इसी वास्तविक अवस्था की शक्ति से हम दुःख या सुख (दोनों से) उबर पाते हैं। हमारी गलती यही होती है हम अपनी वास्तविकता के अनुभव को न मानकर सुख दुःख रूपी वाहनों में सवार हो जाते हैं। और इसी की वजह से हम कभी कभी सुख या दुःख के आवेग में अपने सिद्धांतो और मूल्यों से गिर जाते हैं जिसका पता प्रायः हमें बाद ही में चलता है जबकि अपनी वास्तविकता का ज्ञान होने की वजह से हमें यह ज्ञान हमेशा रहता है की यह गलत है, ऐसा नहीं करना चाहिए।
परन्तु अगर हम धीरे धीरे इस अनुभव का विकास करें की हमारी वास्तविक अवस्था, जो की हम स्वयं है , कभी नही बदलती तो हम इन चीज़ों से उठकर अपने जीवन का कल्याण अति शीघ्र कर सकते हैं। लोग अक्सर यह पुछा करते है दुःख में क्या करें, कैसे करे की दुःख मिट जाए। मित्रों यह मेरे अनुभव की बात है की अगर उसी दुःख को हम मित्रों की सहायता , जीवों की सहायता और
अनेकानेक उपकार में लगा दे तो बस मजा आ जाये। परन्तु इस बात का ध्यान रखें की उसके बदले में कोई आशा न करें। अन्यथा आप फिर से उसी कुचक्र में फंस जायेंगे। और दूसरी बात जब आप दुःख से उबार जाएँ तो भी लोगो की सहायता, जीव कल्याण की भावना को बनाये रखें। और इस तरह धीरे धीरे जब आप अपने को भुला देंगे तो आपको स्वयं यह अनुभव हो जायेगा की सुख और दुःख के आने पर हम किस तरह से अपना धैर्य खोये बिना आगे बढ़ते रहे।
अंत में मैं यही कहना चाहूँगा अपने अनुभव को महत्व दीजिये, उसका तिरस्कार नहीं, क्योंकि अनुभव ही सच्चा ज्ञान है।
श्रीमद्भागवत गीता का ये श्लोक ही मेरे इस लेख का श्रोत है
आप सभी भाइयों भाइयों और बहनों से अनुरोध है की वे नित्य सुबह भावार्थ सहित गीता पाठ जरुर करें, क्यूंकि यह स्वयं भगवान् के मुख से निकली हुई बात है।
http://www.gitapress.org/hindi/homeh.htm
मैं जब छोटा था और जब भी किसी रिश्तेदार के यहाँ जाता था तो कुछ ही दिनों में न जाएं कितनी आत्मीयता उमड़ पड़ती थी और लगता था बस अब यही समय ठहर जाये और हम इसी तरह खुश रहे। लेकिन समय तो बहता ही रहता है और उस समय विछोह की घडी में न जाने कितना दारुण दुःख होता था। जब थोडा बड़ा हुआ, तो अपने करीबी मित्रों की छोटी से छोटी बात का भी न जाने क्या क्या मतलब निकाल कर दुखी रहते थे और कुछ ही पलों के बाद गलतियों का अहसास होते ही लगता था की अब तो हम हमेशा ऐसे ही रहेंगे। लेकिन समय के थपेड़ो ने उनको भी चकनाचूर किया। नौकरी मिलाने के बाद जब थोडा प्रोफेसनल बने तो अपने ही दोस्तों की इनकम बढ़ते देख और भी कष्ट होता और दिन रात यही धुन लगी रहती की कैसे आगे बढ़ जाएँ। इसी समय किसी से प्यार होना न जाने कितने सपने जग देता है और उन सपनों से जगाते भी देर नहीं होती। ध्यान आते ही लगता है की जीवन में अब कुछ नहीं बचा है और अब कैसे इन बातों से छुटकारा पाऊँ। लेकिन सोच विचार पीछा नहीं छोड़ते। वो तो बस धुन मारके इतने पीछे पड़ जाते हैं की पूरा जीवन रसहीन और विषाक्त लगाने लगता है। परन्तु समय बहता है और नयी उमंग नए जोश के साथ फिर बढ़ता है। दांपत्य जीवन के बाद अपने जीवन साथी के सारे सुख और दुःख का दायित्व लेते ही लगता है की हम कहा फंस गए।
परन्तु मित्रों अगर आप मेरी ध्यान से सोचेंगे तभी आप मेरी बात समझ पायेंगे की मैं क्या कहना चाहता हूँ। मैं न तो यहाँ कर्तव्य की बात करता हूँ और न आदर्शों की, बल्कि मेरी बात इससे इतर मेरे अनुभवों की है। आज जब भी मैं सोचता हूँ तो मैं यही पाता हूँ की समय के साथ केवल परिस्थितियां बदलती हैं हम नहीं। अगर हम बदल जाते तो हमें यह नहीं पता चल पता की वास्तव में हम ऐसे ना जाने कितने ही सुखों और दुखों को छोड़ आये हैं। यह ठीक वैसा ही है जैसे की अगर हम किसी बस स्टॉप पर बैठे हैं और बहुत सारी गाड़ियों को आते जाते हुए देखते हैं। परन्तु अगर हम किसी एक पर भी सवार होकर चले गए तो हम ये कभी नहीं जान पाएंगे की कौन कौन सी गाड़ियाँ गुजर गयीं हैं। मेरे विचार से किसी व्यक्ति को सदमा लगना एक ऐसी ही स्थिति है जब मनुष्य एक ही ख्याल और सोच को लेकर बैठा रहता है परन्तु उसकी स्थिति ठीक होते ही उसे अपनी वास्तविक अवस्था का ज्ञात हो जाता है।
जी हाँ दोस्तों मैं उसी वास्तविक और सहज अवस्था की बात कर रहा हूँ जो सुख और दुःख को मात्र आने जाने वाली गाड़ियाँ मानता है। और इसी वास्तविक अवस्था की शक्ति से हम दुःख या सुख (दोनों से) उबर पाते हैं। हमारी गलती यही होती है हम अपनी वास्तविकता के अनुभव को न मानकर सुख दुःख रूपी वाहनों में सवार हो जाते हैं। और इसी की वजह से हम कभी कभी सुख या दुःख के आवेग में अपने सिद्धांतो और मूल्यों से गिर जाते हैं जिसका पता प्रायः हमें बाद ही में चलता है जबकि अपनी वास्तविकता का ज्ञान होने की वजह से हमें यह ज्ञान हमेशा रहता है की यह गलत है, ऐसा नहीं करना चाहिए।
परन्तु अगर हम धीरे धीरे इस अनुभव का विकास करें की हमारी वास्तविक अवस्था, जो की हम स्वयं है , कभी नही बदलती तो हम इन चीज़ों से उठकर अपने जीवन का कल्याण अति शीघ्र कर सकते हैं। लोग अक्सर यह पुछा करते है दुःख में क्या करें, कैसे करे की दुःख मिट जाए। मित्रों यह मेरे अनुभव की बात है की अगर उसी दुःख को हम मित्रों की सहायता , जीवों की सहायता और
अनेकानेक उपकार में लगा दे तो बस मजा आ जाये। परन्तु इस बात का ध्यान रखें की उसके बदले में कोई आशा न करें। अन्यथा आप फिर से उसी कुचक्र में फंस जायेंगे। और दूसरी बात जब आप दुःख से उबार जाएँ तो भी लोगो की सहायता, जीव कल्याण की भावना को बनाये रखें। और इस तरह धीरे धीरे जब आप अपने को भुला देंगे तो आपको स्वयं यह अनुभव हो जायेगा की सुख और दुःख के आने पर हम किस तरह से अपना धैर्य खोये बिना आगे बढ़ते रहे।
अंत में मैं यही कहना चाहूँगा अपने अनुभव को महत्व दीजिये, उसका तिरस्कार नहीं, क्योंकि अनुभव ही सच्चा ज्ञान है।
श्रीमद्भागवत गीता का ये श्लोक ही मेरे इस लेख का श्रोत है
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
भावार्थ : जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।13॥
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः ।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
भावार्थ : हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाशशील और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर॥14॥
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥
भावार्थ : क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है॥15॥
आप सभी भाइयों भाइयों और बहनों से अनुरोध है की वे नित्य सुबह भावार्थ सहित गीता पाठ जरुर करें, क्यूंकि यह स्वयं भगवान् के मुख से निकली हुई बात है।
http://www.gitapress.org/hindi/homeh.htm
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