बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

अपना दिमाग ठंडा रखते हुए मुर्ख व्यक्तियों कि कैसे सहायता करें??? How to help fools and keep ourself calm and cool????

बचपन में प्रायः हम एक खेल खेला करते थे, रस्सी के एक छोर को बांध कर दूसरे छोर से तरंगे भेजते थे और जैसे ही तरंगे दूसरे बंधे हुए छोर से टकराती थी तो उसकी प्रतिक्रिया स्वरुप एक और तरंग पैदा होकर हम तक वापस आती थी. परन्तु बच्चों के इस खेल में एक ऐसा सन्देश छुपा हुआ है जो हमारे व्यक्तित्व को पूरी तरह बदल सकता है और हमें एक सफल इंसान बना सकता है.
हम लोग कभी कभी ऐसी परिस्थिति के शिकार जरूर होते हैं जब हम सामने वाले की मूर्खता पूर्ण बातों का तर्क पूर्ण समाधान नहीं कर पाते है, ऐसे व्यक्ति एक मेढक के कुएं की भाँती उल जलूल तर्क दिया करते हैं और अपनी बातों का समर्थन करने के लिए कुतर्क किया करते हैं , और कभी कभी तो सीधे हमारे ऊपर व्यंग वाक्यों की बौछार सी कर देते हैं . और ऐसी परिस्थिति में हम भी अपना आपा खोकर उसी व्यक्ति के समान कुतर्क करने का प्रयास कर देते हैं और सफल होने पर मन ही मन झुँझला उठते हैं .
ऐसी परिस्थिति में हम उस व्यक्ति की मूर्खता को ही दोषी मानते हैं और हम भी उसी की तरह उलझकर रह जाते हैं और कोई कोई मूर्खता पूर्ण बात बोल देते हैं या कर बैठते हैं जिसे जानकर फिर हमें भारी पछतावा भी होता है. ध्यान से गौर करें या फिर अनुभव करे तो हम पाएंगे कि ऐसे व्यक्ति कि मूर्खता का दोष उतना नहीं होता जितना कि हम सोच बैठते हैं.
हमें ऐसे व्यक्तियों के सामने एक ऐसी दिवार बनानी होती है जो बुरी तरंगो को तो वापस भेज दे परन्तु अच्छी बातों वाली तरंगो को ग्रहण कर ले .इसको आप ऐसे समझ सकते हैं कि अगर कोई व्यक्ति हमारी बुराई कर रहा हो तो ऐसे समय में हमें कोई प्रतिक्रिया देकर धैर्य बनाये रखना होता है और जब वो कोई सही बात कहे तो उसे स्वीकार भी करना होता है ,
अब ऐसा क्यों करना चाहिए ??? इस प्रश्न का उत्तर ढूढने के लिए मैं आपको उदहारण देता हूँ , जैसे कि मान लीजिये कोई व्यक्ति बीमार है, मरीज है , तो क्या आप उसके खाने पीने कि हर डिमांड पूरी करते हो क्या ?? नहीं ना ?? लेकिन साथ ही साथ उसकी उचित डिमांड को पूरी करते हो. ठीक उसी तरह से व्यर्थ बकवास और मूर्खतापूर्ण बात करने वाले बीमार मनुष्य होते हैं , तो हमारा क्या कर्त्तव्य बनता है ??? ऐसे लोगो को हमारी मदद चाहिए होती है ताकि वो विषय को अच्छी तरह से समझ सकें .इसलिए हमें उनकी बातों को ध्यान से सुनना तो चाहिए लेकिन उसमे गलत सही का निर्णय स्वयं करना चाहिए . ध्यान रहे हमें उनको उनकी गलतियां नहीं बतानी हैं बल्कि उनकी अच्छाइयां ही बतानी है ....क्यूंकि अगर हम उनकी गलतियां बताने लगे तो वे उल्टा और क्रोधित होकर और उत्तेजित हो जाएंगे और मामला बिगड़ जाएगा , गलतियां बताने के बजाय उनको इसका एहसास करवाना चाहिए, क्यूंकि मुर्ख व्यक्ति कुछ सुनना नहीं चाहता परन्तु जैसे ही उसे उसकी गलती का अनुभव होगा वो तुरंत सावधान होने का प्रयास करेगा,
अब एक प्रश्न खड़ा होता कि हम उसे उसकी गलती का एहसास कैसे कराएं ?? तो इसके लिए हमें कुछ करने कि जरुरत ही नहीं ,इसके लिए हमें बस एक मजबूत दिवार बनानी होती है बस ...ताकि जब बुरी तरंगे टकराएं तो वो उसी वेग से वापस चली जाएँ जहा से आई हैं .इस दृष्टान्त से यही समझ लेना चाहिए जब कोई व्यक्ति हमें लाख बुरा भला कह रहा हो और अगर हम उस पर कोई प्रतिक्रिया दे तो उस व्यक्ति द्वारा कही हुई वही बातें उसके अंतरमन को उसकी गलतियों  एहसास दिला ही देंगी ,
व्यक्ति को अपनी गलतियों का एहसास कब होता है जब उसका अहंकार टूटता है तब. इसीलिए अगर अहंकार कि मात्रा ज्यादा है तो हो सकता है उसे उसकी गलती का पता बहुत देर बाद हो , परन्तु अगर हमने अहंकार को पहचान लिया तो अपनी गलती समझने में देर नहीं लगती , इसीलिए अगर मूर्खता के साथ अहंकार भी ज्यादा हो तो ऐसे व्यक्तियों से कम से कम वार्तालाप करने में ही भलाई है 
परन्तु साथ ही साथ यह भी सच है हो सकता है कभी कभी हम ही किसी मुर्ख व्यक्ति कि तरह हरकतें कर बैठते हैं इसलिए सर्वप्रथम अपने अहंकार को तोड़कर अपनी गलतियों का अनुभव करके उन्हें स्वीकार करना चाहिए , और यहाँ स्वीकार करने का मतलब यह नहीं हम इसे हर किसी को बताते फिरें बल्कि इनको समझकर इनको दूर करने का प्रयास करें तथा जहाँ गलती हो वहां बिना किसी झिझक के स्वीकार कर ले , तभी हमारी पारमार्थिक , आध्यात्मिक और वैयक्तिक उन्नति संभव है
श्रीमद्भगवद्गीता का यह श्लोक सदा अनुकरणीय है
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु
साधुष्वपि पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते
भावार्थ :  सुहृद् (स्वार्थ रहित सबका हित करने वाला), मित्र, वैरी, उदासीन (पक्षपातरहित), मध्यस्थ (दोनों ओर की भलाई चाहने वाला), द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है॥9  

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