नरेन्द्र मोदी जी भारतीय जनता की मनोभावनों
को एक आतंरिक एकता से जोडते हैं , जो है सबका साथ सबका विकास और जिसकी मूल भावना सर्वे भवन्तु
सुखिनः से जुडी हुई है. सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना ने भरत वंशियों को कई बार एक
किया है, चाहे फिर १८५७
का पहला स्वतंत्रता युध्द हो , दिल्ली चलो अभियान हो, गाँधी जी का सत्याग्रह, या फिर इंदिरा
गाँधी जी द्वारा लगायी गयी एमरजेंसी के तुरंत बाद हुआ चुनाव हो. ये सब लोकतंत्र
के ऐसे उदहारण हैं जिनसे सत्ता धारियों को कुछ न कुछ सीख जरुर मिली है. आज जब
सुचना क्रांति के दौरान प्रबुद्ध , विकसित , भ्रष्टाचार विहीन भारत के निर्माण की बारी
आई है तो अनेक भरतवंशीयों ने अपनी लेखनी से लगातार सत्ताधारियों को
चुनौती दी है और उसका असर सरकार पर और साथ ही साथ हमारी न्याय प्रणाली पर भी पड़ा
है.
हम सब जनता आजतक यही मानती रही की हम सब अपनी परिस्थितियों के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं , क्यूंकि बचपन से हमारे धर्म शास्त्रों में यही पढाया गया है. राजनेता भी यही सब पढाकर भोली-भाली जनता को बेवकूफ बनाते रहे. यहाँ तक की मूलभूत आवश्यकताओं की अनदेखी कर भारतीय यही समझते रहे की धर्म निरपेक्ष भावना ही विकास का मार्ग है. यह बात सही है की हम सब सबके साथ से सबका विकास कर सकते हैं परन्तु इसका मतलब यह नहीं विकास को किसी विशेष धर्म से जोड़कर देखा जाय क्यूंकि अनपढ़ , गवार , अज्ञानी और गरीब लोगो हर धर्म सम्प्रदाय और पंथ से आते हैं जिन्हें धर्म निरपेक्षता के पाठ की नहीं बल्कि उन्हें खाने की लिए रोटी, रहने के लिए घर और सभ्य समाज के साथ चलने हेतु आवश्यक और मूलभूत सुविधाएं होनी चाहिए. और यही सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना है जिसे नरेन्द्र मोदी जैसे विचारक ने मूर्त रूप देकर जन मानस को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि, अरे, हम आजतक जैसे भारत का सपना देख रहे थे मोदी ने तो उन्ही सपनो के एक छोटे से गुजरात में कर दिखाया. जन भावनाये ऐसे ही नहीं जुडती हैं , जब एक व्यक्ति के हृदय की सच्चाई निकलकर दूसरे में और दो से चार और चार से आठ ह्रदय में बैठती है, तो फिर कोई माई का लाल उस भावना को डिगा सकने का सामर्थ्य नहीं रखता.
दूसरी बात जनता को पहले अपनी शक्ति का एहसास नहीं था, लेकिन जब नरेन्द्र मोदी ने छह करोड गुजरातियों को इसी शक्ति का एहसास दिलाया और उसी जन भावना के बल पर सारे विरोधियों को धराशयी करते हुए तीन तीन बार अपना लोहा मनवाया तो १०० करोड से ज्यादा भारतियों को भी अपनी शक्ति का एहसास हो गया की जन भावना और जन भागीदारी से हम कैसे अपनी स्थिति अपने आप सुधार सकते हैं और एक सही राजनेता चुनकर देश के विकास का नया अध्याय जोड़ सकते हैं.
हम सब जनता आजतक यही मानती रही की हम सब अपनी परिस्थितियों के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं , क्यूंकि बचपन से हमारे धर्म शास्त्रों में यही पढाया गया है. राजनेता भी यही सब पढाकर भोली-भाली जनता को बेवकूफ बनाते रहे. यहाँ तक की मूलभूत आवश्यकताओं की अनदेखी कर भारतीय यही समझते रहे की धर्म निरपेक्ष भावना ही विकास का मार्ग है. यह बात सही है की हम सब सबके साथ से सबका विकास कर सकते हैं परन्तु इसका मतलब यह नहीं विकास को किसी विशेष धर्म से जोड़कर देखा जाय क्यूंकि अनपढ़ , गवार , अज्ञानी और गरीब लोगो हर धर्म सम्प्रदाय और पंथ से आते हैं जिन्हें धर्म निरपेक्षता के पाठ की नहीं बल्कि उन्हें खाने की लिए रोटी, रहने के लिए घर और सभ्य समाज के साथ चलने हेतु आवश्यक और मूलभूत सुविधाएं होनी चाहिए. और यही सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना है जिसे नरेन्द्र मोदी जैसे विचारक ने मूर्त रूप देकर जन मानस को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि, अरे, हम आजतक जैसे भारत का सपना देख रहे थे मोदी ने तो उन्ही सपनो के एक छोटे से गुजरात में कर दिखाया. जन भावनाये ऐसे ही नहीं जुडती हैं , जब एक व्यक्ति के हृदय की सच्चाई निकलकर दूसरे में और दो से चार और चार से आठ ह्रदय में बैठती है, तो फिर कोई माई का लाल उस भावना को डिगा सकने का सामर्थ्य नहीं रखता.
दूसरी बात जनता को पहले अपनी शक्ति का एहसास नहीं था, लेकिन जब नरेन्द्र मोदी ने छह करोड गुजरातियों को इसी शक्ति का एहसास दिलाया और उसी जन भावना के बल पर सारे विरोधियों को धराशयी करते हुए तीन तीन बार अपना लोहा मनवाया तो १०० करोड से ज्यादा भारतियों को भी अपनी शक्ति का एहसास हो गया की जन भावना और जन भागीदारी से हम कैसे अपनी स्थिति अपने आप सुधार सकते हैं और एक सही राजनेता चुनकर देश के विकास का नया अध्याय जोड़ सकते हैं.
हमारे राजनेता
ये तो बताते थे की हमारी दुखभरी परिस्थितियों के कारण हमीं हैं लेकिन कभी भी
राजनीती में जन भागीदारी को महत्व नहीं देते थे. लेकिन नरेन्द्र मोदी एक ऐसे नेता
हैं जो यह कहते हैं सभी के दुखों का इलाज़ विकास है और विकास केवल जन आन्दोलन और
प्रत्येक व्यक्ति के भागीदार होने पर ही संभव है. और यही बात भारतीय जन मानस में
धीरे धीरे बैठ रही है और इसी जमी हुई जनभावना से सत्ता धारी पक्ष इतना डरा हुआ है
की उसको अब भागने का भी रास्ता नही मिल रहा है. क्यूंकि आज तक झूठ, फरेब और
सत्ताधारियों और नौकर शाही के कुत्सित गठजोड़ को जनता चुप चाप सहती आई थी लेकिन आज
सोशल मीडिया और जन भावना के संयोग से एक ऐसी है बाढ़ आई है जो इन सब का अंत करने
वाली है.
आज तक राजनीती
को एक बुरा शब्द माना जाता रहा है लेकिन ये नरेन्द्र मोदी जी ही हैं जिन्होंने न
केवल स्वच्छ और पारदर्शी राजनीती पर बल दिया बल्कि साथ ही साथ राजनीती के दिग्गजों
को भी अपनी वोट बैंक की कुत्सित राजनीती को ही सुधारने पर मजबूर कर दिया है.
संक्षेप में तो
बस इतना ही कहना है की नरेन्द्र मोदी एक व्यक्ति नहीं है वो एक सबका साथ सबका
विकास की भावना है जो की अनंत काल से हम भरत वंशियों की परमपरा रही है और जिसको
मोदी जी ने अपने व्यक्तित्व की चिंगारी से जला दी है और यह एक चिंगारी पुरे देश
में ज्ञान के अग्नि को जलाएगी और विश्व पटल पर यही ज्ञानाग्नि भारत के विश्वगुरु होने
का मार्ग प्रशस्त करेगी .
वंदे मातरम
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